Sunday, 11 August 2019

एक तरफ जमीन के नीचे नाला, दूसरी तरफ 33 हजार वोल्ट के तार

(रणविजय सिंह, मेट्रो पार्ट 5, 6 जनवरी 2019)

'जमीन के करीब दो मीटर गहरायी पर 33 हजार वोल्ट के तार बिछे हैं। बीएसएनएल की लाइन भी यहां से गुजर रही है, जिसके सैकड़ों तारों को हटाए बिना खोदायी मुमकिन नहीं। पिलर के लिए खोदायी की तय जगह से कुछ ही दूरी पर अंडरग्राउंड पार्किंग की दीवार है, जिसके टूटने से बड़ा हादसा हो सकता है। सड़क के दूसरी तरफ शिव मंदिर है, जिसके टूटने की आशंका में कई हिंदूवादी संगठन लगातार विरोध प्रदर्शन करते हुए काम रोकने की चेतावनी और धमकी दे रहे हैं...' आलमबाग मेट्रो स्टेशन के लिए खोदायी शुरू करने से पहले आ रही दिक्कतों के बारे में चीफ इंजीनियर को इतना बताकर इंजीनियर चुप हो गए।

पूरी बात सुनकर चीफ इंजीनियर ने धीरे से कहा 'कोई और भी दिक्कत हो तो बता दो...' इसपर पीछे खड़े इंजीनियर ने बताया कि सड़क के दूसरी तरफ जमीन के नीचे दो मीटर गहरायी पर अंडरग्राउंड नाला आ गया है, जिसे डायवर्ट करने के लिए वहां कोई जगह नहीं है और बिना ऐसा किए वहां पिलर बनाना मुमकिन नहीं।' नई समस्या सामने आने पर चीफ इंजीनियर ने पूछा 'यह बात काम शुरू करने से पहले पता क्यों नहीं चली' इसपर जवाब मिला कि नगर निगम, जल संस्थान, जल निगम या एलडीए की तरफ से यहां अंडरग्राउंड नाला होने की जानकारी ही नहीं दी गई थी।

काम शुरू नहीं हुआ और एक के बाद एक कई समस्याएं एक साथ सामने आ गईं। चीफ इंजीनियर अपने केबिन से निकलकर मौके पर पहुंच गए। साथी इंजीनियर से पूछा 'बीएसएनएल को तो दो महीने पहले पत्र भेजकर लाइटें हटाने को कहा गया था, उसका क्या हुआ?' साथी इंजीनियर ने उनकी तरफ पत्र बढ़ाते हुए बताया कि आज ही सुबह जवाब आया है। पत्र पढ़ने के बाद खीझते हुए चीफ इंजीनियर खीझते हुए बोले 'हम मेट्रो बनाने आए हैं, बीएसएनएल के तार बिछाने नहीं...'Ṣ साथी इंजीनियरों ने गुस्से की वजह पूछी तो पता चला कि आलमबाग में खोदायी होनी है लेकिन बीएसएनएल यहां से लेकर चारबाग तक लाइन बदलने की बात कह रहा है और इसके लिए आठ करोड़ रुपये का खर्च होने का प्रस्ताव भेज दिया है। एक तरफ अंडरग्राउंड पार्किंग थी और दूसरी तरफ व्यस्त सड़क, लिहाजा डिजाइन बदलकर पिलर्स की लोकेशन भी इधर उधर करना मुश्किल था। मामला जटिल होता देख चीफ इंजीनियर ने एक एक समस्या को हल करते हुए काम आगे बढ़ाने का फैसला किया। उन्होंने अंडरग्राउंड पार्किंग की तरफ लेसा और बीएसएनएल के तारों तक मैनुअली खोदायी कराने का फैसला किया। उन्होंने इंजीनियरों को समझाते हुए कहा 'दो मीटर या उससे ज्यादा तब तक कर्मचारियों से खोदायी करवायी जाए, जब तक लेसा और बीएसएनएल के तार दिखने ना लगें। उसके बाद पाइल के लिए जितनी जमीन चाहिए, उतने हिस्से से यह तार दाएं बाएं खिसकाकर उन्हें किसी चीज से दबा दो ताकि इसके नीचे 30 मीटर गहरायी तक रिग मशीन से होने वाली खोदायी बिना दिक्कत के हो सके। एक बार कांक्रीट की पाइल तैयार हो जाएगी तो यह तार अपने आप अपनी जगह ले लेंगे।' योजना पर काम शुरू हुआ और एक महीने के भीतर ही बिना तारों को हटाए पाइलिंग होने लगी। हालांकि सड़क के दूसरी तरफ नाला, मंदिर और दुकानदार अभी भी काम शुरू होने की राह का रोड़ा बने हुए थे। चीफ इंजीनियर ने मंदिर प्रबंधन और दुकानदारों के साथ सीधी बात करने का फैसला किया। दुकानदारों से दो टूक बात करते हुए उन्होंने कहा 'हमारे पास सीधे मुख्य सचिव के यहां से अनुमति है। अवैध निर्माण और अतिक्रमण के चलते किसी भी समय ध्वस्तीकरण कराया जा सकता है लेकिन आप लोग काम में सहयोग करें किसी भी तरह की तोड़फोड़ नहीं होगी। जितने दिन काम चलेगा, उतने दिन दुकानदारी कुछ कम होगी' हालात को भांपते हुए दुकानदार काम जारी रखने को लेकर सहमत हो गए।

'जगह तो मिल गई लेकिन नाले का क्या करेंगे?' इंजीनियरों ने खोदायी शुरू कराने से पहले पूछा। इसपर चीफ इंजीनियर ने जवाब देने के बजाय मुस्कुराते हुए पूछा 'टीपी नगर स्टेशन याद है या भूल गए?' कोई जवाब नहीं मिला तो चीफ इंजीनियर खुद ही बोल पड़े 'वहां ग्रीन गैस पाइप लाइन को बचाने के लिए ब्रिज तकनीक का इस्तेमाल हुआ था, यहां भी उसी तकनीक से पाइल बन सकते हैं।' नाले वाले हिस्से को छोड़ते हुए उसके दोनों किनारे पर पाइलिंग के लिए खोदायी हुई। इसके लिए व्यापारियों की दुकानों के दरवाजे तक बेरिकेडिंग कर जमीन के 30 मीटर गहरायी तक खोदायी करनी पड़ीं। दुकानें हमेशा के लिए टूट जाएं, इसके बजाय कुछ दिनों की दिक्कत झेलने को तैयार व्यापारी इसके लिए भी तैयार हो गए। तीसरी बड़ी चुनौती शिव मंदिर को बचाते हुए स्टेशन बनाने की थी। इसके लिए डिजाइन में बदलाव करने का फैसला हुआ, जिसे आला अधिकारियों ने मंजूरी दे दी।

पार्किंग के ऊपर बना दिया एक्जिट :
सिंगार नगर की तरह ही आलमबाग में भी इतनी पर्याप्त जगह नहीं मिली कि मेट्रो स्टेशन में दाखिल होने और बाहर निकलने के लिए अलग अलग रास्ते बनाए जा सकें। हालांकि यहां चीफ इंजीनियर ने प्रॉजेक्ट के लिए परेशानी बन रही अंडरग्राउंड पार्किंग को ही अपने समाधान का जरिया बना लिया। स्टेशन से इस पार्किंग की छत पर ही एल्युमीनियम की सीढ़ी बना दी। यह सीढ़ी पार्किंग की छत पर ठीक उस जगह रखी गई, जिसके नीचे पार्किंग का पिलर बना हुआ है। ऐसा करके मेट्रो ने बिना कोई अतिरिक्त जगह अधिग्रहीत किए ही मेट्रो से बाहर निकलने का बड़ा रास्ता पा लिया। 

Sunday, 4 August 2019

जमीन नहीं मिली तो ट्रैक के एक पिलर्स पर ही खड़ा कर दिखाया पूरा स्टेशन

 (रणविजय सिंह, पार्ट फोर, 3 जनवरी 2019)

..सिंगार नगर मेट्रो स्टेशन का मैप हाथ में लिए कर्मचारियों से घिरे चीफ इंजीनियर बुदबुदाने लगे 'लगता नहीं कि यहां जमीन मिल पाएगी...' इससे पहले कि वो अपनी बात पूरी कर पाते उनका मोबाइल बजने लगा। स्क्रीन पर प्रॉजेक्ट मैनेजर का नाम देखते ही उन्होंने दूसरी तरफ से पूछे जाने वाले सवाल की कल्पना कर ली। फोन रिसीव करते ही उनका अंदेशा सही साबित हुआ 'क्या हुआ? सिंगार नगर में काम क्यों नहीं शुरू हो पा रहा है? व्यापारियों के साथ बात ही होती रहेगी या काम भी शुरू होगा? आपको पता तो है ना कि काम समय पर पूरा करने का कितना दबाव है?'
बिना सवालों के जवाब का इंतजार किए प्रॉजेक्ट मैनेजर ने एक के बाद एक कई सवाल दाग दिए। फोन कान में लगाए चीफ इंजीनियर टहलते हुए साथी इंजीनियरों से कुछ दूर आए और बोले 'पूरे आलमबाग के व्यापारी लामबंद हैं। स्टेशन के लिए एक इंच जमीन छोड़ने को तैयार नहीं। इतनी भी जमीन नहीं है कि स्टेशन में एंट्री और एग्जिट के अलग अलग रास्ते बनाए जा सकें। प्रदेश सरकार की हरी झंडी के बावजूद दुकानों में तोड़फोड़ का सीधा मतलब है कि मामला अदालत में चला जाएगा। एक बार कोर्ट कचहरी शुरू हुई तो फैसला आने तक काम करना मुश्किल हो जाएगा। इस बीच उन्हें फायदे समझाने के साथ ही कार्रवाई की चेतावनी का असर यह हुआ कि व्यापारी दिल्ली जाकर सांसद और गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मिल आए। ऐसे में बल प्रयोग करने से मामला यूपी बनाम दिल्ली हो जाएगा। स्थितियां लगातार जटिल होती जा रही थीं।' इतना बोलकर चीफ इंजीनियर खामोश हो गए और दूसरी तरफ से जवाब का इंतजार करने लगे लेकिन कोई जवाब नहीं मिला तो उन्होंने फिर बोलना शुरू किया 'अब हमारे पास एक ही उपाय है कि जितनी जमीन मिली है, उतने में ही स्टेशन बनाने का काम शुरू करा दिया जाए भले ही इसके लिए डिजाइन में बदलाव करन पड़े'। चीफ इंजीनियर की बात सुनने के बाद प्रॉजेक्ट मैनेजर ने उन्हें नई योजना पर काम करने को मंजूरी दे दी। इसके बाद चीफ इंजीनियर ने सभी इंजीनियरों को अपने केबिन में बुला लिया।
मीटिंग कक्ष में चीफ इंजीनियर के सामने टेबल पर सिंगार नगर स्टेशन का मैप रखा हुआ था। सबके आने के बाद चीफ इंजीनियर ने बोलना शुरू किया 'सिंगार नगर में हमें  एक पिलर पर ही पूरा स्टेशन बनाना होगा।' इतना सुनते ही इंजीनियरों ने हैरानी के साथ उनकी तरफ देखना शुरू कर दिया। कमरे में सन्नाटे को तोड़ते हुए पीछे बैठे शख्स ने पूछा 'मतलब...कैसे?' बिना सवाल पूछने वाले शख्स की तरफ देखे चीफ इंजीनियर ने जवाब दिया 'डिवाइडर पर एलेवेटेड ट्रैक के लिए बनने वाले पिलर को ही यहां इस तरह से डिजाइन करना पड़ेगा ताकि उसपर ट्रैक के साथ 'कैंटी लीवर' बनाकर पूरे स्टेशन को तैयार किया जा सके' सबकी चिंता और परेशानी को भांपते हुए चीफ इंजीनियर ने अपनी आवाज में आत्मविश्वास दिखाते हुए तेज आवाज में कहा 'यह मुमकिन है...' इसके साथ ही मीटिंग खतम हो गई और सभी सिंगार नगर की तरफ रवाना हो गए।
चीफ इंजीनियर ने सिंगार नगर में स्टेशन वाली जगह डिवाइडर पर बन रहे पिलर को अतिरिक्त मजबूती के लिए ज्यादा सरिया और कांक्रीट का इस्तेमाल करने के निर्देश दिए। इसके साथ ही स्टेशन के दायरे में डिवाइडर पर पिलर्स की संख्या भी बढ़ा दी ताकि स्टेशन की मजबूती को लेकर किसी तरह की आशंका ना रहे। इसके बाद इस पिलर पर जमीन से करीब 12 मीटर पर दोनों तरफ स्टेशन का पूरा प्लेटफॉर्म ढ़ाला जाने लगा। इसमें सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण काम यह था कि स्टेशन के नीचे सड़क की तरफ से मजबूती देने के लिए कोई पिलर नहीं बनाया जाना था। 'क्या देख रहे हो...?' सिंगार नगर स्टेशन की तरफ सिर उठाए देख रहे इंजीनियर की तरफ मुस्कुराते हुए चीफ इंजीनियर ने अपने साथी इंजीनियर से पूछा। कुछ सकपकाते हुए इंजीनियर ने कहा 'कुछ नहीं सर...' फिर थोड़ी देर चुप रहने के बाद दोबारा ऊपर की तरफ देखते हुए बोला 'सर मैं सोच रहा था कि यह गिर तो नहीं जाएगा?' सिंगार नगर मेट्रो स्टेशन का मैप हाथ में लिए हुए चीफ इंजीनियर ने मजाकिया लहजे में जवाब दिया 'तो क्या तुम यहां खड़े होकर इसलिए ऊपर देख रहे हो ताकि कैंटी लीवर गिरने से बचा सको'। इतना कह दोनों हंसने लगे लेकिन चीफ इंजीनियर खुद भी जानते थे कि जो चुनौती उन्होंने ले ली है, उसे पूरा करना इतना आसान नहीं है। करीब दो महीने महीने तक दिनरात निगरानी और मेहनत के बाद चीफ इंजीनियर अपनी पूरी टीम के साथ सिंगार नगर मेट्रो स्टेशन के नीचे खड़े थे। ऊपर पूरा प्लेटफॉर्म बिना सड़क की तरफ अतिरिक्त पिलर बनाए तैयार हो चुका था। ऊपर देख रहे साथी इंजीनियरों की पीठ ठोंकते हुए चीफ इंजीनियर मुस्कुराते हुए बोले 'मैने कहा था ना कि यह मुमकिन है' इतना सुनते ही वहां मौजूद सभी खिलखिलाकर हंस पड़े।

Friday, 25 January 2019

जड़ समेत बरगद के 4 टुकड़े किए, चारों से बनाए नए पेड़



(रणविजय सिंह, पार्ट टू, 23 दिसंबर 2018)

लखनऊ : 'आप जुर्माना लगा दीजिए या मशीन सीज करवा दें, मैं काम नहीं कर सकता...'। इतना कहते हुए सरदार जी क्रेन के ड्राइवर को साथ लेकर डिपो से बाहर निकल गए। 'सर... एक क्रेन पहले ही जमीन में धंस चुकी है। बड़ी तलाश के बाद कानपुर से किसी तरह क्रेनें मंगवाईं थीं। अब अगर ये भी चली गईं तो काम कैसे होगा? पेड़ भी एक-दो नहीं 900 से ज्यादा हैं'। पर्यावरण अभियंता ने यह कहते हुए चीफ इंजिनियर की तरफ मायूसी से देखा। सबको परेशान देख उद्यान अधिकारी बोले, एक उपाय है लेकिन...। चीफ इंजिनियर ने पूछा, लेकिन क्या? उद्यान अधिकारी बोले, 'यह तरीका इतने पुराने और वजनी पेड़ों पर कीाी इस्तेमाल नहीं हुआ। इसलिए गारंटी नहीं ले सकता पेड़ बचाया जा सकेगा।
डिपो से लेकर चारबाग तक 120 से 130 टन तक के पेड़ निकालकर दूसरी जगह लगाए जाने हैं। इन्हें बचाना भी है। इस कोशिश में डिपो के भीतर दो क्रेनें धंस चुकी हैं। इसके बाद कोई दूसरा क्रेन मालिक आने को तैयार नहीं। हमारी क्रेन 130 टन के पेड़ जड़ समेत उठाकर ले जाने में सक्षम नहीं हैं। चीफ इंजिनियर ने एक सांस में सारी परेशानी उद्यान अधिकारी के सामने रखते हुए उपाय बताने को कहा। उद्यान अधिकारी के उपाय पर किसी को यकीन नहीं हुआ कि इसके बाद पेड़ बचेगा भी या नहीं। कोई और रास्ता नहीं सूझने पर चीफ इंजिनियर ने बताए गए तरीके से काम करने की मंजूरी दे दी।

अनिष्ट की आशंका में छंटाई को तैयार नहीं थे कर्मचारी :
योजना पर काम शुरू भी नहीं हुआ था कि नई समस्या आ गई। सुपरवाइजर ने बताया कि अनिष्ट की आशंका में कोई भी कर्मचारी पीपल के पेड़ों की टहनियां काटने को तैयार नहीं है। बिना कुछ बोले चीफ इंजिनियर कर्मचारियों की तरफ चल पड़े। पीपल के पेड़ के पास जमीन पर बैठे कर्मचारी उन्हें देखते ही हाथ जोड़कर खड़े हो गए। चीफ इंजिनियर ने समझाया, 'आप लोग पीपल काट नहीं रहे, बल्कि उसे बचा रहे हैं। टहनी नहीं कटेगी तो पूरा पेड़ काटना पड़ेगा। बचाने के लिए हल्का किया जाना जरूरी है। इसके बाद निकालकर शनि मंदिर के पास लगाया जाएगा। पेड़ कटने से बचेगा पाप नहीं पुण्य मिलेगा'। कर्मचारियों को बात समझ आ गई और छंटाई शुरू हो गई। हालांकि बरगद को हटाना अब भी सिरदर्द बना हुआ था। डिपो से लेकर टीपी नगर और चारबाग के बीच तमाम ऐसे पेड़ थे, जिन्हें बिना काटे, दूसरी जगह लगाना चुनौती था।
पहली बार जड़ समेत पेड़ के टुकड़े कर बचाया
चीफ इंजिनियर की मंजूरी के बाद उद्यान अधिकारी ने वह काम शुरू किया जो अब तक केवल किताबों में पढ़ा था। टहनियां कटवाने के बाद पेड़ का वजन करीब 130 टन आंका गया। पेंड़ के तने का व्यास करीब सात फुट था। तने के एक मीटर दायरे में जड़ की तरफ जमीन पर निशान लगाया गया। इसके बाद आधे हिस्से में दो से तीन मीटर तक खोदाई की गई। इसके बीच आने वाली जड़ों को काटा जाता रहा और उन्हें बचाने के लिए प्लांट हार्मोंस ऑक्सिन का लेप लगाया जाता रहा। इसमें 15 दिन लगे। इसके बाद यही कवायद बचे आधे हिस्से में की गई। चारों तरफ से जड़ समेत खोदाई होने और कटी जड़ों पर हार्मोंस के लेप के बाद बोरी से बांधकर 5 से 10 दिन के लिए छोड़ दिया गया। इसके बाद इस तने को ऊपर से लंबाई में जड़ तक चार टुकड़े में काटा गया। सभी हिस्सों पर प्लांट हार्मोंस ऑक्सिन का लेप किया गया। इसके बाद सामान्य क्रेन से टुकड़ों को डिपो की बाउंड्री के पास पहले से बनाए गए गड्ढे में लगाया गया। करीब छह महीने तक देखभाल की गई और चारों टुकड़े नए पेड़ बन गए।

डर के आगे जीत है :
पहले जिस पेड़ को बचाना मुश्किल लग रहा था, वहीं चार जगह हरियाली फैला रहा है। चीफ इंजीनियर समेत डिपो में मौजूद अधिकारियों के लिए भी यह किसी अजूबे से कम नहीं था। इसके बाद चीफ इंजिनियर ने उद्यान अधिकारी और वन अधिकारी को बुलाकर पूछा 'यह बताओ कि तुमने पहले से ही योजना बना ली थी या मौके का इंतजार कर रहे थे'। वन अधिकारी ने मुस्कुराते हुए कहा कि पहले ही सर्वे कर पेड़ों की नम्बरिंग कर ली थी। इसमें पेड़ों की उम्र, प्रजाति और मौसम देखकर दूसरी जगह लगाने की संभावनाओं को भी परख लिया था। कुछ देर चुप रहने के बाद चीफ इंजिनियर की तरफ रिपोर्ट बढ़ाते हुए कहा, इस प्रॉजेक्ट में टीपीनगर डिपो से चारबाग तक के रूट में 981 पेड़ काम के आड़े आ रहे थे। इनमें पीपल, बरगद, कचनार, मौलश्री, चितवन, टीक, कंजी और सेमल जैसे पेड़ थे। सभी पेड़ों को बचा लिया गया।

जरा सी चूक से उड जाती टीपी नगर की सड़क और ग्रीन गैस पंप

(रणविजय सिंह, पार्ट थ्री, 27 दिसंबर 2018)
आप समझ नहीं रहे हैं... रिग मशीन का जरा सा झटका लगेगा और टीपी नगर से अमौसी तक की ब्लास्ट होने लगेंगे। आसपास की इमारतें भी गिर सकती हैं... पूरे लखनऊ की सप्लाई ठप हो जाएगी सो अलग... फैसला आप लोगों को लेना है। इतना सुनते ही एलएमआरसी टीम के साथ आए आला अधिकारी सकते में आ गए... पूछा, 'क्यों भाई? क्या नीचे बारूद बिछा हुआ है'। अफसरों के चेहरे पर प्रॉजेक्ट लेट होने की आशंका और समय पर काम पूरा करने का दबाव साफ झलक रहा था। मामले को संभालने की कोशिश करते हुए साइट पर मौजूद इंजिनियर ने जवाब दिया...'सर, बारूद नहीं, लेकिन ग्रीन गैस की पाइप लाइन बिछी है, जो अमौसी के पंप से जुड़ी है। इसी लाइन से पूरे लखनऊ में ग्रीन गैस की सप्लाई होती है...। हमारी पाइलिंग ठीक इसके ऊपर है, रिग मशीन एक बार में जमीन के नीचे एक से डेढ़ मीटर तक खोद देती है...ऐसे में मशीन दायरे में आने पर ग्रीन गैस की पाइप का फटना तय है'।
इतना बोलकर इंजीनियर चुप हो गए और चारों तरफ सन्नाटा छा गया। चुप्पी तोड़ते हुए एलएमआरसी टीम के साथ आए अफसर ने लगभग चीखते हुए पूछा, ...तो इस पाइप लाइन को अब तक हटवाया क्यों नहीं गया? इस सवाल पर इंजिनियरों का जवाब सुनकर अफसरों के होश उड़ गए। उन्होंने कहा जमीन के नीचे पाइपों में ग्रीन गैस भरी हुई है, एजेंसी इसे शिफ्ट करने की मंजूरी देने को तैयार नहीं है, पाइप लाइन कितनी गहरायी पर है? यह भी उन्हें नहीं पता। पाइपों में गैस की मात्रा और लोकेशन भी एजेंसी साझा करने को तैयार नहीं है। इतना कहकर एक बार फिर इंजिनियर समाधान की आस में अफसरों का चेहरा देखने लगे। कुछ देर सोंचकर अफसरों ने एहतियात के साथ खोदायी के विकल्प पर विचार करते हुए पूछा कि हादसा होने पर बचाव के उपाय क्या हैं? जवाब मिला कि ग्रीन गैस की तरफ से ऐसे टिप्स या उपाय बताने में भी असमर्थता जता दी गई है। इतना सुनने के बाद टीपी नगर स्टेशन का काम अटकने की आशंका में अफसरों के चेहरे का रंग ही उड़ गया...।
नहीं हारे हिम्मत
ग्रीन गैस के साथ सामंजस्य के सारे रास्ते बंद होने के बाद सिविल इंजिनियरों की टीम ने समाधान का उपाय खोजना शुरू किया। चीफ इंजिनियर और अधिकारियों की घंटों की माथापच्ची के बाद तय हुआ कि अगर ग्रीन गैस की तरफ से पाइप लाइन की लोकेशन नहीं मिल रही तो एलएमआरसी खुद खोजेगा। इसके बाद भी समस्या का पूरा समाधान नहीं हुआ, क्योंकि लोकेशन मिलने के बाद भी पाइप लाइन हटाने के लिए ग्रीन गैस ने एनओसी देने से इनकार कर दिया। लेकिन कहते हैं कि जहां चाह वहां राह। एलएमआरसी ने भी काम करने की ठान ली थी। एक बार फिर मेट्रो ने ग्रीन गैस के अफसरों से बात करने पर डिजाइन और जमीन के नीचे पाइप लाइन की पहचान करने वाला लोकेटर मुहैया करवा दिया गया। हालांकि इस मशीन से भी जमीन के नीचे केवल दो मीटर तक की ही जानकारी मिल पा रही थी। ऐसे में जेसीबी से जमीन को दो मीटर तक खोदने के बाद गड्ढा बनाया गया। इसके बाद उसमें लोकेटर रखकर पाइप का पता लगाया गया और पाइप लाइन मिलने तक रिग मशीन के बजाय कर्मचारियों से करवाई।
ब्रिज तकनीक
एलएमआरसी टीम और सिविल इंजिनियरों ने समाधान के तौर जमीन के नीचे ब्रिज तकनीक का इस्तेमाल कर पाइलिंग करने का फैसला किया गया। देश के शायद ही किसी दूसरे मेट्रो प्रॉजेक्ट में इस तकनीक से पाइलिंग हुई होगी, लेकिन विवाद से बचते हुए समय पर काम करने के लिए दूसरा कोई चारा भी नहीं था। जमीन के नीचे 25 मीटर गहरायी तक पाइलिंग की गई लेकिन ग्रीन गैस के पाइप वाले हिस्से के चारों तरफ ब्रिज तकनीक के जरिए खाली छोड़ दिया गया। इसके लिए पाइलिंग के मूल डिजाइन में आंशिक बदलाव किया गया।

दलदली जमीन पर सैकड़ों टन की मशीनें चला डिपो बनाने की थी चुनौती

(रणविजय सिंह, पार्ट वन, 20 दिसंबर 2018)

लखनऊ: 'एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा' बुदबुदाते हुए मेट्रो डिपो के चीफ इंजिनियर हाथ बांधकर इधर से उधर टहलने लगे। उन्हें परेशान देख इंजिनियरों से चुप नहीं रहा गया। वे पूछ बैठे, 'क्या हुआ सर? अब क्या समस्या आ गई?' यह सुनकर चीफ इंजिनियर ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया 'अभी पता चला है कि डिपो के लिए जो जमीन मिली है, उसका बड़ा हिस्सा दलदली है। सैकड़ों टन की मशीनें उसके आसपास भी गईं तो जमीन भी धंस जाएगी।'
'पूरी तरह से खाली जमीन पर डिपो बनाने में औसतन दो साल लगता है, लेकिन हमें एक साल में काम पूरा करना है। इसके बावजूद हमें पीएसी की वह जमीन दी गई है, जिस पर पहले से स्कूल, मकान, मंदिर और ऑफिस बने हैं। इन्हें भी एक तरफ से तोड़ने के बजाय हमें पीएसी के लिए ये इमारतें दूसरी जगह बनाकर देनी हैं। इसके बाद यहां लगे पेड़ों को भी काटने के बजाय उन्हें जड़ समेत निकालकर दूसरी जगह लगाना है। यह सब करते हुए भी दो साल का काम हम एक साल में करने की तैयारी कर रखी थी लेकिन...'। एक सांस में ही यह सब बताने के बाद चीफ इंजिनियर कुछ देर रुके और फिर बोले, '...और अब पता चल रहा है कि जमीन भी दलदली है।'
डिपो की डिजाइन में बदलाव कर अहम इमारतों को जमीन के दलदली हिस्से के बजाय दूसरी जगह शिफ्ट किया जा सकता था, लेकिन उसके लिए भी समय नहीं था। इस बीच 15 जून 2015 को काम शुरू करने का ऐलान हो गया। एक सप्ताह तक सोच-विचार के बाद हुई बैठक में अचानक चीफ इंजिनियर आए और बोले 'डिजाइन के मुताबिक जिस जमीन पर जो इमारत बननी है, वह वहीं बनेगी।' इससे पहले कि कोई कुछ समझता, उन्होंने जमीन का जियोलॉजिकल सर्वे करवाने के अलावा तहसीलदार और इंजिनियरों को जमीनों की दोबारा पैमाइश करने को कहा।
अगले दिन चीफ इंजिनियर के दफ्तर पहुंचने से पहले ही टेबल पर पूरी रिपोर्ट पड़ी थी। साथी इंजिनियरों के बीच उन्होंने बुदबुदाते हुए रिपोर्ट पढ़ी, '46 एकड़ कुल जमीन में से नौ एकड़...' इतना सुनते ही सामने बैठे इंजिनियर ने कहा, 'मतलब करीब 20 फीसदी जमीन तो दलदली ही है। रिपोर्ट दोबारा टेबल पर रखते हुए उन्होंने 15 दिन के भीतर दलदली हिस्से की खोदाई कर वहां बालू से भरने को कहा। इसके बाद जेसीबी लगाकर 15 दिन में दलदली जमीन की खोदाई की गई और 30 ट्रक से ज्यादा बालू भरी गई। फिर कच्ची मिट्टी डाली गई। इसके बाद भी डिपो में रिसीविंग सब स्टेशन के लिए तय जमीन इतनी मजबूत नहीं हो सकी कि वहां भारी मशीनें चढ़ाई जा सकें।
अब क्या करें? साथी इंजीनियरों के इस सवाल पर चीफ इंजिनियर ने कहा, 'अब इस पूरी जमीन पर कंक्रीट पाइलिंग करनी होगी। 5000 वर्ग फुट से ज्यादा क्षेत्रफल में कंक्रीट की चादर बिछानी पड़ेगी।' यब सुनकर बगल में खड़े इंजिनियर बोल पड़े, '...लेकिन यह तकनीक तो एलेवेटेड रूट पर पिलर्स को मजबूती देने में इस्तेमाल होती है। आज तक किसी भी मेट्रो प्रॉजेक्ट के डिपो में इसका इस्तेमाल नहीं सुना।' इसके बाद काम शुरू हुआ और एक महीने बाद पूरे डिपो में अफसरों ने सैकड़ों टन की मशीनों को दौड़ते देखा। प्रॉजेक्ट में देरी की आशंका से घबराए इंजिनियरों को काम होने के बाद चीफ इंजीनियर ने बुलाया और बोले कि 'मैं न कहता था कि ऐसा कुछ नहीं जो इंजिनियर न बना सके।' इतना सुनते ही सबके चेहरे पर मुस्कान बिखर गई।

Friday, 21 December 2018

आम आदमी की सड़क, नाली खंडजा के बजट से लामार्ट्स में बनवा दिया स्वीमिंग पूल


रणविजय सिंह, लखनऊ : सड़क, नाली और खड़ंजे के लिए आए बजट से एलडीए के पूर्व उपाध्यक्ष और इंजिनियरों ने लामार्टिनियर गर्ल्स कॉलेज में ऑडिटोरियम, लिफ्ट, सीसीटीवी सिस्टम, फायर अलार्म और ऑल वेदर स्वीमिंग पूल बनवा दिया। मामले का खुलासा इकॉनमिक ऐंड रेवेन्यू सेक्टर ऑडिट के महालेखाकार की जांच में हुआ। ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि एलडीए अधिकारियों ने तत्कालीन प्रदेश सरकार के निर्देश पर यह काम करवाने की बात कही है, जिसे ऑडिट टीम ने खारिज कर दिया है। ऑडिट टीम के मुताबिक आम जनता के लिए जारी हुई समग्र विकास निधि से निजी संस्था या उसकी इमारत में निर्माण कार्य करवाना किसी भी सूरत में जनहित में लिया गया फैसला नहीं माना जा सकता।
शासन से एलडीए को समग्र विकास निधि (आईडीएफ) के तौर पर मिले 45 करोड़ रुपये का करीब आधा हिस्सा लामार्टीनियर गर्ल्स कॉलेज पर खर्च कर दिया गया। ऑडिट आपत्ति से जुड़े दस्तावेज के मुताबिक एलडीए के पूर्व उपाध्यक्षों और इंजिनियरों ने 22 करोड़ रुपये केवल इस कॉलेज में लगा दिए। नियमों के मुताबिक आईडीएफ से होने वाले किसी भी काम को मंजूरी देने के लिए कमिश्नर की अध्यक्षता में कमिटी बनी हुई है। इस कमिटी में जिलाधिकारी, एलडीए उपाध्यक्ष, नगर आयुक्त शामिल होते हैं। इसके बावजूद इस पूरे काम को कमिटी के सामने नहीं रखा गया। ऊपर से मिले निर्देश के बाद तत्कालीन एलडीए उपाध्यक्ष ने इन कार्यों का एस्टीमेट बनाया और यह जानते हुए भी काम शुरू करवा दिया कि लामार्टिनियर एक निजी संस्था है और मिशनरीज द्वारा चलाई जाती है। रिपोर्ट के मुताबिक 1 जनवरी 2016 से लामार्टिनियर में शुरू हुआ काम सितंबर 2017 तक चला, जिसका खर्च एलडीए ने आईडीएफ से उठाया।
ऐसे हुआ खर्च
रु 2,74,63000 ऑडिटोरियम और ऑल वेदर स्वीमिंग पूल पार्ट-वन पर
रु 1,58,02,000 लाइटिंग, फायर फाइटिंग, फायर अलार्म, ऑडियो सिस्टम, सीसीटीवी और लिफ्ट पर
रु. 17,76,21,000 ऑडिटोरियम और ऑल वेदर स्वीमिंग पूल पार्ट-2
इन अफसरों के कार्यकाल के दस्तावेजों की हुई जांच
सत्येंद्र सिंह यादव : 28 अगस्त 2016 तक
अनूप यादव : 29 अगस्त 2016 से 23 दिसंबर 2016 तक
सत्येंद्र सिंह यादव : 24 दिसंबर 2016 से 18 अप्रैल 2017 तक
अनिल गर्ग : 19 अप्रैल 2017 से 8 मई 2017 तक
प्रभु एन सिंह : एक जनवरी 2017 से 20 जून 2017 तक
अभी मैंने आपत्तियां पढ़ी नहीं हैं। हालांकि बिना चीफ इंजिनियर की संस्तुति के समग्र विकास निधि से करवाए गए किसी भी काम का भुगतान नहीं हुआ होगा। रिपोर्ट देखने के बाद ही मैं इस बारे में ज्यादा विस्तार से बता सकूंगा।
-राजीव कुमार, वित्त नियंत्रक, एलडीए

अंधी कुतिया को बंधक बनाकर, देसी कुत्ते पकड़वाने की डिमांड


रणविजय सिंह, लखनऊ : 
रसूखदार की शिकायत पर देसी कुत्ते पकड़ने पहुंचे नगर निगम के कर्मचारियों को निराशा हाथ लगी तो वे इन कुत्तों को रोटी खिलाने वाली महिला की अंधी डॉगी (पॉमेरियन) को उठा ले गए। दो दिन से महिला और उसका बेटा डॉगी को छुड़ाने के लिए नगर निगम के चक्कर लगा रहा हैं, लेकिन अफसर उनसे पहले कुत्ते पकड़वाने को कह रहे हैं। महिला ने शनिवार को नगर निगम के मुख्य पशु चिकित्साधिकारी अरविंद राव, अपर नगर आयुक्त अनिल मिश्रा और नगर आयुक्त इंद्रमणि त्रिपाठी से मिलकर उन्हें अपनी कुतिया का टीकाकरण और पंजीकरण से जुड़े दस्तावेज भी दिखाए, लेकिन कोई राहत नहीं मिली।
अलीगंज के सेक्टर एल में रहने वाले एक रसूखदार को मुहल्ले में घूमने वाले देसी कुत्तों से परेशानी है। मुहल्ले में ही रहने वाली रेनू मिश्रा इन कुत्तों को रोज रोटी खिलाती हैं। इसे लेकर रसूखदार और रेनू मिश्रा के बीच कई बार नोकझोंक भी हो चुकी है। इस बीच रसूखदार ने नगर निगम अफसरों से शिकायत कर इन्हें पकड़ने का दबाव बनाया। इसपर नगर निगम की टीम ने बुधवार को मुहल्ले में छापा मारा। कैटल कैचिंग दस्ते को देखते ही कुत्ते भाग गए। इनमें से दो कुत्ते रेनू मिश्रा के घर में बैठे थे। नगर निगम की टीम उन्हें पकड़ने पहुंची तो रेनू मिश्रा ने दरवाजा खोलकर उनको भगा दिया। खाली हाथ लौटे कर्मचारियों को नगर निगम अफसरों ने फटकार लगाई तो गुरुवार को नगर निगम के कर्मचारी पुलिस के साथ रेनू मिश्रा के घर पहुंचे। उस समय वो घर पर नहीं थीं। उनके बुजुर्ग पिता ने दरवाजा खोला तो नगर निगम के कर्मचारियों ने भीतर सोई उनकी अल्सेशियन डॉगी को उठा ले गए। इसके बाद रेनू मिश्रा नगर निगम पहुंचीं, लेकिन कोई अधिकारी नहीं मिला। शुक्रवार को कोई अधिकारी नहीं मिला, लेकिन कर्मचारियों ने बताया कि मुहल्ले के देसी कुत्ते पकड़ने का ऊपर से काफी दबाव है। बिना उन्हें पकड़े, डॉगी को नहीं छोड़ा जाएगा। परेशान होकर रेनू शनिवार को अपर नगर आयुक्त से मिलीं, लेकिन कोई समाधान नहीं हुआ।
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मेरी डॉगी अंधी है। उसका टीकाकरण हो चुका है। बिना मेरे वो कुछ खाती नहीं है। इसके बाद भी उसे उठा ले गए। मैं शपथपत्र देने को तैयार हूं कि मुहल्ले के देसी कुत्तों को कुछ नहीं खिलाऊंगी।
-रेनू मिश्रा, पीड़िता
मुहल्ले में रेनू मिश्रा ने दर्जनों देसी कुत्ते पाले हुए हैं। इन्हें रोज दूध ब्रेड और रोटी खिलाती हैं। इससे मुहल्ले वालों को परेशानी है। उनके घर से जो कुतिया पकड़ी गई, उसका लाइसेंस मांगा गया है। लाइसेंस मिलते ही उसे छोड़ दिया जाएगा।
अनिल मिश्रा, अपर नगर आयुक्त, नगर निगम

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