Tuesday, 23 May 2017

चहेतों को नियुक्त करने के लिए बाकियों को कॉल लेटर ही नहीं भेजा



(रणविजय सिंह, 23 अप्रैल 2017, लोहिया इंस्टीट्यूट पार्ट फाइव)

चहेतों को असिस्टेंट प्रोफेसर बनाने के लिए लोहिया इंस्टीट्यूट के अधिकारियों ने हर वो दांव इस्तेमाल किया जो वो कर सकते थे। पिछली सरकार में इन पदों के लिए विज्ञापन करने से लेकर चुनाव के दौरान प्रतिनियुक्ति का प्रस्ताव, इंटरव्यू और बीजेपी सरकार में गुपचुप तैनाती को लेकर अब कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं।
एनबीटी की पड़ताल में सामने आया कि विज्ञापन के बाद आवेदन करने वाले कई अभ्यर्थियों को इंटरव्यू के लिए बुलाया ही नहीं गया। जिन्हें बुलाया उन्हें भी महज दो दिन पहले कॉल लेटर भेजा, ताकि दूर दराज के अभ्यर्थी समय से आ ही ना सकें। इसके बावजूद जो इंटरव्यू के दिन पहुंच गए, उनके अनुभव प्रमाणपत्रों और एनओसी समेत दूसरे मानकों की बारीक पड़ताल हुई और मामूली कमियां बताकर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। यह तमाम तौर तरीके इस्तेमाल करने के बाद भी जिन विभागों में अधिकारी अपने चहेतों की भर्ती करने में सफल होते नहीं दिख रहे थे, उन विभागों का इंटरव्यू ही स्थगित कर दिया। इन तौर तरीकों का इस्तेमाल करते हुए मानसिक रोग, स्किन और आई विभाग को छोड़कर इंटरव्यू के जरिए बाकी विभागों में केवल इतने पदों पर भर्ती की गई ताकि असिस्टेंट प्रोफेसर 10 पद खाली रह जाएं। इस तरह हर विभागों के लिए दर्जनों काबिल आवेदकों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और सात अप्रैल को एमसीआई की टीम आयी तो आपात स्थिति का हवाला देते हुए इन पदों पर लोहिया अस्पताल के 10 डॉक्टरों को प्रतिनियुक्ति पर तैनाती दे दी।
_ स्वास्थ्य निदेशालय में अपर निदेशक (प्रशासन) रहे डॉ़ आरवी सिंह ने लोहिया इंस्टीट्यूट में असिस्टेंट प्रोफेसर और मेडिकल सुपरीटेंडेंट के लिए आवेदन किया था। उन्हें कॉल लेटर नहीं भेजा गया। बतौर डॉ़ आरवी सिंह आवेदन करने के बाद वे कई बार निदेशक प्रो़ दीपक मालवीय, प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा अनीता भटनागर जैन एवं महानिदेशक डॉ़ बीएन त्रिपाठी से भी मिले लेकिन उन्हें इंटरव्यू में शामिल करना तो दूर इसकी सूचना तक नहीं दी गई।
_ गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के डॉ़ मनीष सिंह ने कम्युनिटी मेडिसिन विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए आवेदन किया था। इन्हें महज दो दिन पहले कॉल लेटर भेजा गया। सभी मानक पूरे करने के बावजूद चयन नहीं हुआ और आज तक लोहिया इंस्टीट्यूट ने कोई रिजल्ट वेबसाइट या दूसरे तरीकों से सार्वजनिक नहीं किया, जिसे देखकर डॉ़ मनीष को यह भी नहीं पता चला कि उनका चयन हुआ है या नहीं।
_ लखनऊ स्थित निजी मेडिकल कॉलेज के एक डॉक्टर ने आवेदन किया था लेकिन लोहिया इंस्टीट्यूट ने उन्हें कॉल लेटर नहीं भेजा। पूछने पर बताया गया कि उन्होंने जिस कॉलेज का टीचिंग एक्सपीरिएंस लगाया है, उसमें एक साल एमबीबीएस के दाखिले नहीं हुए थे। लिहाजा उनका तीन साल का टीचिंग एक्सपीरियंस नहीं माना जा सकता। इसके उलट इसी कॉलेज के एक अन्य आवेदक को कॉल लेटर भेज दिया गया। इस मनमानी पर पूछताछ हुई तो निदेशक प्रो़ दीपक मालवीय ने कोई सीधा जवाब नहीं दिया।
_ लोहिया इंस्टीट्यूट के लिए जारी विज्ञापन में पैथोलॉजी विभाग के लिए कोई विज्ञापन ही नहीं हुआ। इसके बावजूद एमसीआई के निरीक्षण में इस विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर की कमी दिखाते हुए लोहिया अस्पताल के डॉ़ संजय जायसवाल की नियुक्ति दिखा दी गई। यही नहीं साइकियाट्री, डरमैटोलॉजी एंड लेप्रोसी और ऑप्थेलमोलॉजी विभाग में कोई इंटरव्यू ही नहीं कराया गया और शिक्षकों की कमी दिखाते हुए अस्पातल से डॉक्टरों को असिस्टेंट प्रोफसर बना दिया।

दीपक मालवीय से बातचीत :
सवाल : आवेदन करने वाले कई डॉक्टरों को कॉल लेटर नहीं भेजा गया।
जवाब : सभी आवेदनों पर विचार के लिए स्क्रीनिंग कमिटी बनी थी। इस कमिटी की सिफारिश पर ही कॉल लेटर भेजे गए। जिन्हें योग्य नहीं पाया गया, उन्हें नहीं भेजा गया।
सवाल : कई विभागों में इंटरव्यू नहीं कराए गए?
जवाब : हां, शेड्यूल नहीं होने के कारण तीन विभागों में इंटरव्यू नहीं हो सके थे। जल्द ही इन विभागों के इंटरव्यू कराने की तैयारी है।
सवाल : लखनऊ स्थित एक निजी मेडिकल कॉलेज के एक डॉक्टर को कॉल लेटर भेजा गया और दूसरे को नहीं भेजा गया। ऐसा क्यों?
जवाब : यह जवाब तो स्क्रीनिंग कमिटी ही दे सकती है कि ऐसा क्यों हुआ। कई बार गलती से भी हो जाता है लेकिन जहां तक मेरी जानकारी है, इस कॉलेज के जिस अभ्यर्थी को कॉल लेटर गया था, उसे सिलेक्ट नहीं किया गया।
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मैने लोहिया इंस्टीट्यूट में मेडिकल सुपरीटेंडेंट और असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए सभी मानक पूरे करते हुए आवेदन किया था। मुझे कॉल लेटर तक नहीं भेजा गया। अब पता चला रहा है कि भर्तियां हो चुकी हैं।
डॉ़ आरवी सिंह, पूर्व अपर निदेशक

चहेतों को नियुक्त करने के लिए जो नियम नहीं थे, उन्हें मान लिया



(रणविजय सिंह, 22 अप्रैल 2017, लोहिया इंस्टीट्यूट पार्ट फोर)

लोहिया इंस्टीट्यूट में अधिकारियों ने अपने चहेतों को असिस्टेंट प्रोफेसर बनाने के लिए विज्ञापन की शर्तों से इतर उन्हें योग्य साबित करने के लिए जो नियम जहां से मिला, उसे मान लिया। अस्पताल का लोहिया इंस्टीट्यूट में विलय नहीं हुआ था लेकिन अधिकारियों ने विलय मानते हुए उन्हें प्रतिनियुक्ति पर तैनात करने का तर्क दिया। लोहिया के 10 डॉक्टरों के पास असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर आवेदन के लिए तीन साल का टीचिंग एक्सपीरिएंस नहीं था तो अधिकारियों ने इन डॉक्टरों के लिए विज्ञापन से इतर दिल्ली के ईएसआई अस्पतालों के नियम लगा दिए। यही नहीं अस्पताल के वरिष्ठ डॉक्टरों के रहते जूनियर को मौका देने के लिए बहना बना दिया कि सीनियर तो जल्द ही रिटायर होने वाले हैं, लिहाजा उन्हें नहीं लिया जा सकता।
लोहिया इंस्टीट्यूट में असिस्टेंट प्रोफेसरों की नियुक्ति में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां हुई हैं। कैबिनेट मंत्री, आईएएस और इंस्टीट्यूट के आला अधिकारियों ने अपने चहेते डॉक्टरों को असिस्टेंट प्रोफेसर बनाने के लिए विज्ञापन के नियमों में जमकर मनमानी की। नियमों को न सिर्फ तोड़ा गया, बल्कि मनमानी को सही साबित करने के लिए इधर उधर के नियम लगा दिए गए। लोहिया इंस्टीट्यूट के निदेशक प्रो़ दीपक मालवीय का तर्क है दिल्ली के ईएसआई अस्पतालों में डॉक्टरों के अनुभव  को टीचिंग के लायक माना जाता है। हालांकि उनके पास इस सवाल का जवाब नहीं है कि जो नीति यूपी में लागू नहीं है, उसे केवल एक संस्थान में कैसे लागू किया जा सकता है। वहीं लोहिया अस्पातल का विलय न होने की स्थिति में भी केवल वहीं के चुनिंदा 10 डॉक्टरों के चयन पर अधिकारियों के पास जवाब नहीं है।

सीएम से मिलकर नीति बनाने की मांग :
प्रांतीय चिकित्सा सेवा संघ ने मुख्यमंत्री से मिलकर सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों को असिस्टेंट प्रोफेसर बनाए जाने की नीति बनाए जाने की मांग की है। अध्यक्ष डॉ़ अशोक यादव ने लोहिया अस्पताल के चुनिंदा डॉक्टरों को लोहिया इंस्टीट्यूट में असिस्टेंट प्रोफेसर बनाए जाने को गलत बताया। उन्होंने कहा कि प्रदेश के करीब 1200 डॉक्टर एमडी, एमएस डिग्री धारक हैं। इन सभी के पास असिस्टेंट प्रोफेसर बनने की योग्यता है। ऐसे में केवल कुछ डॉक्टरों को मौका दिया जाना सही नहीं है। उन्होंने सीएम को यह भी  सुझाव दिया कि अस्पतालों के इन 1200  डॉक्टरों की मदद से मेडिकल कॉलेजों में असिस्टेंट प्रोफेसरों की कमी को दूर किया जा सकता है लेकिन इसके लिए कोई पारदर्शी नीति बनायी जाए, ताकि मनमानी न होने पाए।

रिश्तेदारों का जमावड़ा :
लोहिया अस्पताल के कई विभागों में 30 से 40 फीसदी पदों पर यहां तैनात डॉक्टर, एचओडी और अधिकारियों के रिश्तेदार जमे हुए हैं। विभागों में तैनात कइ डॉक्टर तो ऐसे हैं, जिनका चयन करने वाली चयन समिति तक में उनके रिश्तेदार शामिल थे। यही नहीं अस्पताल में संविदा पर हुई भर्तियों में भी जमकर भाई भतीजावाद किया गया है। भ्रष्टाचार मुक्त भारत के मोहम्म्द शारिक खान का आरोप है कि पिछली सरकार में लोहिया इंस्टीट्यूट को एक खास राजनीतिक दल के करीबी नेता और अधिकारियों का एंप्लायमेंट हाउस बना दिया गया था।

एमसीआई से कहा 'तत्काल नियुक्ति', शासन से कहा 'अनुमति मिली तब चयन'


(रणविजय सिंह, 20 अप्रैल 2017, लोहिया इंस्टीट्यूट पार्ट थ्री)

लोहिया अस्पताल के 10 डॉक्टरों को असिस्टेंट प्रोफेसर बनाने का खाका खींचने के बाद लोहिया इंस्टीट्यूट के अधिकारियों ने मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) और शासन को गुमराह करने के लिए दो अलग अलग पत्र तैयार किए थे। आला अधिकारियों ने शासन से कहा कि इनके चयन का प्रस्ताव है, मंजूरी मिलने के बाद चयन होगा, जबकि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के अधिकारियों को सौंपे दस्तावेज में इन सभी को इंस्टीट्यूट में तत्काल प्रभाव से नियुक्ति देने की बात लिखी थी। चौंकाने वाली बात यह है कि इस पत्र में इंस्टीट्यूट के निदेशक प्रो़ दीपक मालवीय के दस्तखत भी हैं।

सवाल जिनके जवाब अधिकारियों के पास नहीं हैं :
_ लोहिया इंस्टीट्यूट और लोहिया अस्पताल का विलय अभी तक नहीं हुआ है। लोहिया अस्पताल का काम चिकित्सा स्वास्थ्य विभाग के तहत आता है जबकि लोहिया इंस्टीट्यूट चिकित्सा शिक्षा विभाग के अधीन है। ऐसे में बिना दोनों विभागों के प्रमुख सचिव और महानिदेशकों की जानकारी के लोहिया अस्पताल के 10 डॉक्टरों को लोहिया इंस्टीट्यूट में प्रतिनियुक्ति पर तैनाती का फैसला क्यों और किसके दबाव में किया गया?
_ चिकित्सा शिक्षा के महानिदेशक डॉ़ बीएन त्रिपाठी और चिकित्सा स्वास्थ्य के महानिदेशक डॉ़ पद्माकर ने डॉक्टरों को असिस्टेंट प्रोफेसर बनाए जाने या उनके चयन के प्रस्ताव तक की जानकारी से खुद को अनजान बताया। वहीं चिकित्सा स्वास्थ्य के प्रमुख सचिव अरुण सिन्हा ने भी इस मामले में जानकारी न दिए जाने की बात कही और चिकित्सा शिक्षा विभाग की प्रमुख सचिव अनीता भटनागर जैन भी पूरे मामले से अनजान हैं।
_ अस्पताल के 10 डॉक्टरों को असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर तैनाती दी गई। इनमें से दो डॉक्टरों ने बकायदा शासन से इसके लिए एनओसी मांगी। बाकी डॉक्टरों ने क्यों नहीं मांगी। ऐसे में अगर इन 10 की नियुक्ति के तौर तरीकों को सही भी मान लें तो या एनओसी न लेने वाले आठ डॉक्टर सही हैं या फिर एनओसी लेने वाले दो डॉक्टर। इसके बावजूद इंस्टीट्यूट ने सभी 10 डॉक्टरों पर अपनी कृपा एक समान तरीके से बरसायी।
_ शासनादेश के मुताबिक लोहिया अस्पताल और लोहिया इंस्टीट्यूट के संबंध में कोई भी फैसला लेने के लिए शासन स्तर पर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में कमिटी बनी हुई है। इसमें प्रमुख सचिव (वित्त), प्रमुख सचिव (चिकित्सा स्वास्थ्य), प्रमुख सचिव (चिकित्सा स्वास्थ्य) और निदेशक (लोहिया इंस्टीट्यूट) को सदस्य बनाया गया है। ऐसे में डॉक्टरों को असिस्टेंट प्रोफेसर बनाए जाने का फैसला इस कमिटी के जरिए क्यों नहीं किया गया?

नियुक्ति अभी नहीं हुई है, हमने शासन से अनुमति मिलने की आशा में यह नाम भेजे हैं। वहां से मंजूरी के बाद नियुक्ति होगी। हालांकि एमसीआई के सामने इन्हें असिस्टेंट प्रोफेसर ही दिखाया गया था, क्योंकि ऐसा न करते तो इस साल हमें एमबीबीएस की 150 सीटों की मान्यता न मिल पाती।
प्रो़ दीपक मालवीय, निदेशक
लोहिया इंस्टीट्यूट

अभी विलय को लेकर अंतिम फैसला होना है। इससे पहले लोहिया अस्पताल और उसके डॉक्टरों को लेकर किसी भी तरह का फैसला लोहिया इंस्टीट्यूट नहीं कर सकता। डॉक्टरों को असिस्टेंट प्रोफेसर बनाए जाने या उनका नाम भेजे जाने की कोई सूचना मुझे नहीं है।
अरुण सिन्हा, प्रमुख सचिव
चिकित्सा स्वास्थ्य

योग्यता थी, न आवेदन किया, न इंटरव्यू दिया, फिर भी हो गया चयन


(रणविजय सिंह, 18 अप्रैल 2012, लोहिया इंस्टीट्यूट पार्ट टू)

लोहिया इंस्टीट्यूट में असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए जिन 10 डॉक्टरों की नियुक्ति का आदेश डॉ़ दीपक मालवीय के दस्तखत से जारी हुआ, उनमें से आठ डॉक्टर ऐसे हैं जिन्होंने इन पदों के लिए आवेदन तक नहीं किया था। यही नहीं विज्ञापन के मुताबिक इनके पास असिस्टेंट प्रोफेसर के लायक योग्यता थी, ना उन्हें चिकित्सा स्वास्थ्य विभाग से आवेदन की एनओसी मिली थी और न ही उन्होंने इंटरव्यू ही दिया। इसके बावजूद लोहिया इंस्टीट्यूट ने सात अप्रैल को मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के सामने इन डॉक्टरों को असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर उसी दिन पेश कर, उनकी नियुक्ति को मंजूरी के लिए शासन में फाइल भेज दी। वहीं जिन अभ्यर्थियों ने योग्यता पूरी करते हुए आवेदन किया और इंटरव्यू के बाद चयनित हुए, उन्हें एमसीआई का निरीक्षण होने के एक दिन बाद आठ अप्रैल और उसके बाद नियुक्ति पत्र सौंपा गया।
लोहिया इंस्टीट्यूट में एमबीबीएस की 150 सीटों के लिए मान्यता का निरीक्षण एमसीआई की टीम को सात अप्रैल को करना था। इसके लिए खाली पदों पर भर्ती का विज्ञापन पिछले साल आठ सितंबर को हुआ था। विज्ञापन के मुताबिक असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर आवेदन के लिए तीन साल की टीचिंग एक्सपीरिएंस होना अनिवार्य था। सूत्रों के मुताबिक इन पदों पर हुए आवेदन के लिए इंटरव्यू समेत नियुक्ति की कवायद 20 मार्च को पूरी हो गई थी। इसके बावजूद अधिकारी छइ अप्रैल तक इंटरव्यू के रिजल्ट रोके रखे। इस बीच सात अप्र्रैल को एमसीआई का निरीक्षण होना था। ऐसे में आपात स्थिति दिखाते हुए लोहिया इंस्टीट्यूट के निदेशक प्रो़ दीपक मालवीय ने अस्पताल के 10 डॉक्टरों को असिस्टेंट प्रोफेसर बताते हुए पेश कर दिया। एमसीआई को दिए गए कागज में इन्हें असिस्टेंट प्रोफेसर बताया गया, जबकि शासन को भेजी गई फाइल में अधिकारियों ने अपनी गरदन बचाने के लिए 'शासन की अनुमति मिलने की प्रत्याशा में असिस्टेंट प्रोफेसर' लिख दिया गया।

केवल दो डॉक्टरों ने ली है एनओसी :
लोहिया अस्पताल के जिन 10 डॉक्टरों को असिस्टेंट प्रोफेसर बनाया गया है, उनमें से केवल दो डॉक्टरों डॉ़ देवाशीष और डॉ़ सुरेश अहिरवार ने ही शासन से एनओसी लेकर आवेदन किया है और इंटरव्यू फेस करते हुए सिलेक्ट हुए हैं। इन दोनों डॉक्टरों को शासन की मंजूरी चिकित्सा स्वास्थ्य विभाग के पास मंजूरी के लिए पड़ी हुई है। सूत्रों के मुताबिक बाकी किसी भी डॉक्टर को स्वास्थ्य विभाग ने आवेदन के लिए एनओसी नहीं दी है।

सीनियरिटी का भी ख्याल नहीं रखा :
लोहिया इंस्टीट्यूट के निदेशक प्रो़ दीपक मालवीय का कहना है कि एमसीआई का निरीक्षण अचानक होना था, लिहाजा मान्यता बचाने के लिए विभागों के सबसे सीनियर डॉक्टरों को असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर पेश किया गया। एनबीटी ने उनके इस तर्क की पड़ताल की तो पता चला कि उनका दावा पूरी तरह से सही नहीं है। मेडिसिन विभाग में डॉ़ एसी श्रीवास्तव और डॉ़ एससी मौर्या सबसे सीनियर हैं लेकिन उन्हें नहीं सिलेक्ट किया गया। वहीं जनरल सर्जरी में डॉ़ एसी द्विवेदी सबसे सीनियर हैं लेकिन लिस्ट में उनका नाम नहीं है। वहीं आप्थॉल्मोलॉजी में डॉ़ राकेश शर्मा सीनियर हैं लेकिन उनसे जूनियर डॉ़ प्रीति गुप्ता का सिलेक्शन कर लिया गया। वहीं विज्ञापन के मुताबिक पैथोलॉजी विभाग में कोई पद ही नहीं था, बावजूद इसके शासन को भेजी गई सूची में इस विभाग के लिए डॉ़ संजय जायसवाल का नाम जोड़ दिया गया।


यह सही है कि इंटरव्यू 20 अप्रैल को हुए थे लेकिन उसका रिजल्ट चुनाव के चलते जारी नहीं किया गया। सरकार बनने के बाद इसके लिए मुख्य सचिव से मंजूरी ली जानी थी। इसमें थोड़ी देर हुई और सात अप्रैल को अचानक एमसीआई की टीम निरीक्षण के लिए आ गई। ऐसे में हमने इमरजेंसी जैसे हालात में लोहिया अस्पताल से सीनियारिटी के लिहाज से 10 डॉक्टरों को चुना और उन्हें शासन की अनुमति मिलने की आशा में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर दिखा दिया। ऐसा करने के पीछे हमारी कोई गलत मंशा नहीं थी, बल्कि ऐसा नहीं करते तो एमबीबीएस की मान्यता एक साल के लिए पिछड़ जाती।
प्रो़ दीपक मालवीय, निदेशक
लोहिया इंस्टीट्यूट 

रसूखदार के रिश्तेदारों की परीक्षा ना इंटरव्यू, सीधे नियुक्ति पत्र


(रणविजय सिंह, 17 अप्रैल 2017, लोहिया इंस्टीट्यूट पार्ट वन)

सरकार बदलते ही लोहिया इंस्टीट्यूट में असिस्टेंट प्रोफेसरों की भर्ती में भारी गड़बड़ी सामने आयी है। इस महीने सात अप्रैल को लोहिया इंस्टीट्यूट के निदेशक प्रो़ दीपक मालवीय की तरफ से लोहिया अस्पताल के 10 डॉक्टरों को असिस्टेंट प्रोफेसर के पद नियुक्ति दे दी गई। यही नहीं एमबीबीएस की मान्यता के मानक पूरे दिखाने के लिए लोहिया इंस्टीट्यूट ने इन सभी को मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की टीम के सामने बतौर शिक्षक पेश भी कर दिया, जबकि यह सारे लोहिया इंस्टीट्यूट के बजाय आज भी लोहिया अस्पताल की ओपीडी में ही बैठ रहे हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि चिकित्सा स्वास्थ्य के महानिदेशक डॉ़ पद्माकर सिंह और लोहिया अस्पताल के निदेशक डॉ़ सीएस नेगी को इस बात की जानकारी ही नहीं है कि उनके 10 डॉक्टरों को लोहिया इंस्टीट्यूट में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति मिल चुकी है।

तौर तरीकों और टाइमिंग पर सवाल :
लोहिया अस्पताल का लोहिया इंस्टीट्यूट में विलय होने पर यहां के करीब 50 डॉक्टरों ने असिस्टेंट प्रोफेसर के पदों पर प्रतिनियुक्ति पाने का आवेदन कर रखा है। लोहिया इंस्टीट्यूट ने एमबीबीएस की 150 सीटों के मानक पूरे करने के लिए पिछले साल 8 अक्टूबर को कई विभागों में शिक्षकों के पदों पर विज्ञापन जारी किया। इस बीच विधानसभा चुनाव शुरू हो गए, लिहाजा नई नियुक्तियों और तैनाती पर रोक लग गई। इसके बावजूद लोहिया इंस्टीट्यूट ने इस साल नौ फरवरी को सात डॉक्टरों की सूची चिकित्सा शिक्षा अनुभाग 2 को भेज दी। इसमें बताया गया था कि इन सातों डॉक्टरों को प्रतिनियुक्ति पर तैनात किए जाने का प्रस्ताव है। इस बीच सरकार बदल गई। इसके बावजूद सात अप्रैल को निदेशक प्रो़ दीपक मालवीय ने पत्र जारी कर इस सूची में तीन नए डॉक्टरों के नाम जोड़े और सभी को प्रतिनियुक्ति पर तैनात किए जाने का आदेश जारी कर दिया।

इन्हें दी गई तैनाती :
डॉ़ संदीप चौधरी (मेडिसिन), डॉ़ सुशील कुमार श्रीवास्तव (मेडिसिन), डॉ़ अजय कुमार सिंह (जनरल सर्जरी), डॉ़ शैलेश कुमार श्रीवास्तव (जनरल सर्जरी), डॉ़ निर्मेश भल्ला (आर्थो), डॉ़ संजय जैन (पीडियाट्रिक्स), डॉ़ देवाशीष शुक्ला (साइकियाट्रिक्स), डॉ़ सुरेश अहिरवार (चर्म एवं गुप्त रोग), डॉ़ प्रीति गुप्ता (आप्थोल्मोलॉजी) और डॉ़ संजय जायसवाल (पैथोलॉजी)। सूत्रों के मुताबिक डॉ़ प्रीति गुप्ता सपा सरकार में सचिव मुख्यमंत्री रहे आईएएस अधिकारी अमित गुप्ता की पत्नी हैं। वहीं डॉ़ संजय जायसवाल को सूचना आयुक्त सुदेश कुमार का रिश्तेदार बताया जाता है। यही नहीं डॉ़ निर्मेश भल्ला, डॉ़ शैलेश कुमार श्रीवास्तव, डॉ़ संदीप चौधरी और डॉ़ सुरेश अहिरवार को मुख्यमंत्री के सलाहकार डॉ़ आरसी अग्रवाल का करीबी माना जाता था। इसके अलावा डॉ़ संजय भल्ला और डॉ़ सुशील कुमार श्रीवास्तव उन डॉक्टरों में शुमार किए जाते थे, जिन्हें जरूरत के वक्त सपा परिवार के सदस्यों को देखने लोहिया अस्पताल से भेजा जाता था। वहीं डॉ़ अजय कुमार सिंह को सपा सरकार के कैबिनेट मंत्री रहे राजा भईया का करीबी होने की अटकलें लगायी जाती हैं।

लोहिया इंस्टीट्यूट हमारे डॉक्टरों को तैनाती कैसे दे सकता है। हमने अभी तक किसी डॉक्टर को रिलीव तक नहीं किया है। ऐसे में अगर उन्होंने ऐसा कुछ किया है तो गलत है। हमें इस संबंध में जानकारी भी नहीं दी गई है। लोहिया अस्पातल और इंस्टीट्यूट के विलय को अभी केवल सैद्धांतिक मंजूरी मिली है। मुझसे पूछा गया था लेकिन मैने साफ कह दिया है कि कर्मचारी, डॉक्टर और दूसरे संसाधनों की शर्तें तय किए बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते।
डॉ़ पद्माकर सिंह, महानिदेशक
चिकित्सा स्वास्थ्य

हमारे किसी डॉक्टर को लोहिया इंस्टीट्यूट में प्रतिनियुक्ति पर तैनाती दिए जाने की कोई सूचना मुझे नहीं है। हमने ना तो इसके लिए अपनी सहमति दी है और न ही इंस्टीट्यूट की तरफ से हमें इस बारे में कुछ बताया गया है।
डॉ़ सीएस नेगी, निदेशक
लोहिया अस्पताल

प्रो़ दीपक मालवीय से सीधी बात :
सवाल : लोहिया अस्पताल के कितने डॉक्टरों को प्रतिनियुक्ति पर बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर तैनाती दी गई है?
जवाब : अभी तैनाती नहीं दी गई है। इसका प्रस्ताव है।
सवाल : लेकिन आपकी तरफ से सात अप्रैल को पत्र जारी कर नियुक्ति दिए जाने की बात कही गई है।
जवाब : हां, लेकिन वह शासन से मंजूरी की प्रत्याशा में जारी की गई थी।
सवाल : उस पत्र में शासन से प्रत्याशा पर नियुक्ति का तो कोई जिक्र नहीं है।
जवाब : नहीं, नहीं। ऐसा नहीं होगा। मैं दिखवाता हूं। एमसीआई के सामने मानक पूरे दिखाने के लिए इन्हें शासन से मंजूरी की प्रत्याशा में ही प्रतिनियुक्ति पर दिखाया गया था।
सवाल : अभी इन डॉक्टरों को चिकित्सा स्वास्थ्य से रिलीव नहीं किया गया है। ऐसे में कैसे तैनाती दे दी गई?
जवाब : नहीं जो कुछ भी होगा मानकों के मुताबिक होगा। मैं दिखवाता हूं।

Friday, 18 November 2016


डिफॉल्टर उद्योगपतियों और स्विस बैंक खातों का ब्योरा क्यों नहीं देती संसद

नोटबंदी के बाद आम आदमी अपने ही दो हजार रुपयों के लिए बैंकों के बाहर धूप में खड़ा है लेकिन इन्हीं बैंकों से 
करीब आठ लाख करोड़ रुपया कर्ज लेकर हजम कर चुके करीब तीन हजार औद्योगिक घरानों को सरकार और विपंक्ष जनता के सामने खड़ा करने को तैयार नहीं है। हमारी संसद स्विस बैंक में भारतियों के खातों की जानकारी देने को भी तैयार नहीं है। चौंकाने वाली बात यह है कि नोटबंदी के बाद राज्य सभा और लोकसभा में हुई बहस के दौरान विपक्ष ने इन दोनों मुद्दों पर सरकार को मजबूती से घेरने के बजाय पीएम मोदी की व्यक्तिगत आलोचना और हंगामे में समय बिता दिया। यह दोनों सवाल ऐसे हैं, जिसे अगर विपक्ष मुद्दा बनाकर जनता के बीच ले जाता तो बैंकों के बाहर घंटों कतार में खड़ी जनता सरकार को कोसते हुए चर्चा जरूरत करती। वहीं डिफॉल्टर औद्योगिक घरानों और स्विस बैंक खाता धारकों के नाम सार्वजनिक करने या ऐसा करने से इंकार करने पर सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा हो जाती।
       मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक करीब 40 सूचिबद्ध बैंकों से करीब तीन हजार उद्योगपतियों ने 4,43,691 करोड़ रुपए कर्ज लेकर वापस ही नहीं किया। वहीं अगर  उद्योगपतियों को दिए गए ऐसे कर्जों को भी जोड़ लिया जाए, जिनका वापस मिलना मुश्किल होता जा रहा है तो यह रकम आठ लाख करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगी। जनता की गाढ़ी कमाई कर्ज के तौर पर लेकर ऐश करने वाले डिफॉल्टर उद्योगपतियों का नाम सार्वजनिक करने को सरकार तैयार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से यह नाम पूछे उसके बावजूद सरकार डिफाल्टर उद्योगपतियों के साथ गलबहियां डाले खड़ी दिख रही है। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि राज्य सभा और लोकसभा में विपक्ष ने इतने मजबूत मुद्दे को हाथ से क्यों जाने दिया? चर्चा की शुरूआत करने वालों ने नोटबंदी को लेकर पीएम नरेंद्र मोदी की तुलना हिटलर, गद्दाफी और मुसोलिनी से की, जिसका सरकार या मोदी की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मोदी सरकार पर इस तरह के व्यक्तिगत हमले होने से वे असहज नहीं होते बल्कि उनकी ताकत ही बढ़ती है। विपक्ष की तरफ से किसी ने नहीं पूछा कि देश के बैकों में लगभग अस्सी लाख करोड़ रुपपे की जमापूंजी जसका पचहत्तर प्रतिशत राशि छोटे बचतकर्ताओं और आम लोगों की है, वह बड़े औद्योगिक घरानों के पास कर्ज की शक्ल में क्यों और कैसे चली गई? अगर लोन तय नियमों के तहत दिया गया तो उन्होंने तय नियमों के तहत वह रकम लौटायी क्यों नहीं? न उसे केवल दाबे बैठे हैं बल्कि गुलछर्रे उड़ा रहे हैं, बाावजूद सरकार उनपर इतनी मेहरबान क्यों है? किसी ने नहीं पूछा कि डिफॉल्टर औद्योगिक घरानों को सरकार से राहत और बैंकों से आसानी से करोड़ों रुपये का कर्ज कैस मिल जाता है जबकि छोटे कर्जदारों (किसानों) को मामूली रकम के लिए भी बैंकों के कई-कई चक्कर लगाने होते हैं?

डिफॉल्टर उद्योगपतियों के नाम पर ‘’पक्ष-विपक्ष साथ साथ हैं’’ :
बैंकों के बाहर कतार में खड़ी जनता का आठ लाख करोड़ रुपये दबाए बैठे उद्योगपतियों को सामने लाने में वर्तमान सरकार की दिलचस्पी नहीं दिखती और पिछली सरकार में शामिल विपक्ष भी इसके लिए ज्यादा उत्साहित नहीं है। असल बात यह है कि संसद में बैठे सभी ताकतवर और कमजोर दलों को पता है कि स्विस बैंक में किनके खाते हैं और डिफॉल्टर उद्योगपति कौन हैं? कांग्रेस 50 साल तक सरकार में थी, उसके साथ सपा, बसपा, कम्युनिस्ट पार्टी का एक धड़ा और दूसरे प्रांतों के क्षेत्रीय दल भी केंद्र में सत्तासुख भोग चुके हैं। ऐसे में उनमें से कोई भी चाहे तो डिफॉल्टर उद्योगपतियों और स्विस बैंक के भारतीय खाताधारकों के नाम सार्वजनिक कर सकता है लेकिन वे ऐसा नहीं करेंगे। यह तो नहीं ही माना जा सकता कि संसद के बाहर मीडिया को जो बातें लुकेछिपे पता चल जाती हैं कि उसकी जानकारी सत्ता में रहते हुए इन लोगों को नहीं होगी। असल में ज्यादातर औद्योगिक घराने सभी राजनीतिक दलों को हर साल उनकी क्षमता के मुताबिक बराबर बराबर चंदा देते हैं। न एक हजार रुपये ज्यादा न एक हजार कम। उप्र के एक औद्योगिक घराने ने एक राष्ट्रीय स्तर की पार्टी को चंदा देने से मना कर दिया था, उसके बाद ताकत में वापस लौटने वाली उस पार्टी ने सरकारी मशीनरी का पूरा इस्तेमाल करते हुए उस औद्योगिक धराने का सहारा छिनने की स्थिति पैदा कर दी। सभी राजनीतिक दल जनता की गाढ़ी कमाई का अरबों रुपये दबाए बैठे इन औद्योगिक घरानों से हर साल चंदे के तौर पर मोटी रकम वसूलते हैं। यही वजह है कि कोई भी दल चाहे वो सत्ता में हो या विपक्ष में इनके नाम जनता के सामने लाने को तैयार नहीं होता।

जनता की जेब कटती है और उसी से करवाते हैं भरपाई :

बैंकों से अरबों रुपये लोन लेकर दबाए बैठे उद्योगपतियों में से एक नाम किंग कॉरपोरेट के नाम से पहचाने जाने वाले विजय माल्या हैं। इन्होंने सत्रह बैंकों का नौ हजार करोड़ रुपए कर्ज लिया। सरकारी मशीनरी ने माल्या को जिस दरियादिली से कर्ज मुहैया कराया, उसी दरियादिली से उन्हें भारत छोड़कर जाने भी दिया। इससे साफ है कि कर्ज के डूबने-डुबाने के खेल में राजनीति, नौकरशाही, कारोबार और बैंक प्रबंधन का पूरा भ्रष्ट गठजोड़ शामिल है। इस तरह डुबायी जा रही जनता की रकम, बैंक जनता से ही वसूलते हैं। बैंक कर्ज वापस न मिलने का बहाना बनाते हुए घाटा दिखा देते हैं और सरकार आम खाता धारकों की ब्याज दरें घटाकर या उनकी सुविधाओं में कटौती कर इस घाटे को पूरा कर लेती है।

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