Friday, 23 October 2015

बिहार चुनाव में आरक्षण की समीक्षा का लिटमस टेस्ट

इस देश में आम समझ वाला आम आदमी भी यह बात समझता है कि आरक्षण को चुनौती देकर चुनाव नहीं जीता जा सकता है। खासकर हिंदी पट्टी के प्रदेशों, उनमें भी यूपी और बिहार को लेकर तो ऐसा ही है। इसके बावजूद सामाजिक विचारकों और बुद्धिजीवियों से भरे हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की तरफ से आरक्षण की समीक्षा के बयान जारी किए गए। वह भी उस समय जब बिहार के चुनाव सिर पर थे। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने चुनाव का ऐलान होने के कुछ ही दिनों बाद और फिर पहले चरण के मतदान से एक दिन पहले आरक्षण को लेकर जो बयान दिए उसे चुनावी रणनीतिकार भले गलत समय पर दिया गया गलत बयान बताएं लेकिन मुझे लगता है आरएसएस ने पूरी रणनीति के तहत बिहार चुनाव को आरक्षण के लिटमस टेस्ट के लिए चुना है। वह भी इतने फुलप्रूफ प्लानिंग के साथ कि नतीजे कुछ भी आएं लेकिन किसी भी सूरत में बीजेपी को ज्यादा लम्बे समय तक नुकसान नहीं होगा।
       बिहार जाति के लिहाज से सबसे कट्टरपंथी राज्य है। पिछले 25 से 30 साल के दरम्यान जाति आधारित जितना रक्तपात हुआ उतना शायद ही किसी राज्य में हुआ हो। हिंदी भाषी राज्यों में जातियों की सेनाएं केवल इसी राज्य में बनीं जिनके मुटभेड़ों से पैदा हुई नफरत वहां की फिजाओं में अब भी मौजूद है। इसके बावजूद आरएसएस ने बिहार चुनाव से पहले आरक्षण के जिन्न को बोतल से यूं ही निकाला। इससे पहले पूरी तैयारी की गई। बिहार चुनाव को पांच चरणों में करवाने का फैसला हुआ। बिहार चुनाव के लिए निर्णायक माने जा रहे महादलित जीतन राम माझी की अगुवाई में बीजेपी के साथ हैं। लिहाजा बिना डरे पहले चरण से पहले आरक्षण का बयान बिहार चुनाव के कैमिकल में डाला गया। इसका रिएक्शन पहले चरण के मतदान के बाद चैनलों और अपने निजी संस्थाओं के एक्जिट पोल के जरिए सामने आ जाएगा। पहले चरण का मतदान भी बीजेपी के लिए ज्यादा डैमेजिंग न हो इसके लिए महंगाई, साहित्यकार बनाम सरकार और गाय जैसे दूसरे भावनात्मक कैमिकल भी इस चुनाव के फ्लास्क में डाले गए। इतने फुलप्रूफ प्लान के साथ पहले चरण के मतदान पर आरक्षण के बयान का असर देखा जाएगा। नतीजे ज्यादा विपरीत दर्ज किए गए तो बाकी चार चरणों के लिए अलग से प्लान। पहले चरण के बाद दूसरे, तीसरे, चौथे और पांचवें चरण के मतदान के लिए बयान, मूद्दों और घटनाओं की अलग श्रृंखलाएं पहले से तय हैं। इनमें सबसे अहम केंद्र सरकार की तरफ से चुनाव जीतने के बाद बिहार के उद्योग, युवाओं को रोजगार और खेती किसानी को चमकाने का खुला आश्वासन।
       इन तमाम कोशिशों और के बाद दो नतीजे सामने आ सकते हैं। एक यह कि बीजेपी चुनाव जीत जाए या फिर बीजेपी चुनाव हार जाए। अगर बीजेपी चुनाव जीत गई तो यह आकलन लगाया जा सकता है कि देश में आरक्षण की समीक्षा हो सकती है। इसके उलट अगर बीजेपी चुनाव हार गई तो प्रदेश में जनता दल युनाइटेड के नीतिश कुमार और राष्ट्रीय जनता दल के लालू प्रसाद यादव की मिलीजुली सरकार बनेगी। नीतिश कुमार और लालू प्रसाद यादव के काम करने की शैली बिल्कुल उलट है। नीतिश की क्षवि विकास और स्वच्छ प्रशासन को तरजीह देने वाले नेता की है, वहीं लालू प्रसाद और उनकी टीम प्रशासन को अपने ठेंगे पर रखकर शासन चलाने के लिए जाने जाते हैं। ऐसे में किसी को इसमें अचरज नहीं होना चाहिए कि गठबंधन के बाद बनी सरकार अपने अंतरविरोधों के चलते छह महीने से ज्यादा न चल सके। इसके बाद यहां केंद्र सरकार अपने मुताबिक नए चुनाव की तारीख तय करेगी। नए मुद्दों, नए वादों, नए अनुभव और नई तैयारियों के साथ। साथ ही संघ के लिए भी यह फैसला करना आसान हो जाएगा कि देश में आरक्षण की समीक्षा का यह समय है या नहीं।
 
 

Saturday, 29 November 2014

जब तक रहा, अपनों से दूर रहा दिल्ली में


दिल्ली स्टेशन पर उतरने के बाद मोबाइल चेक किया। एक में नेटवर्क नहीं था और दूसरे मोबाइल में बैलेंस। मेरे करीबियों के लिए मेरी यह हालत कोई नई बात नहीं है। मुझे भी इसकी आदत सी है, लिहाजा सोचा कि इंडिया हैबिटेट सेंटर में मीडिया ब्रीफिंग के बाद बैलेंस डलवा लूंगा। सुबह करीब 10 बजे से ब्रीफिंग शुरू हुई। बदिल्ली में होने के कारण मोबाइल रोमिंग में था और बैलेंस न होने के कारण उसमें न तो कॉल आ सकती थी और न ही जा सकती थी। शाम चार बजे हम सभी को वर्कशाप चलने के लिए कहा गया। बीच में आधे घंटे का समय था। इस बीच चाय की व्यवस्था थी। कलेजे पर पत्थर रखकर मैने चाय छोड़ी और मोबाइल में बैलेंस के लिए नेशनल हैबिटेट सेंटर से निकलकर लोधी रोड की दुकानों का रुख किया। करीब आधे घंटे तक पैदल मार्च के बाद हर दुकान से यही जवाब मिला कि यहां बीएसएनएल नहीं चलता लिहाजा वे मेरी कोई मदद नहीं कर सकते। अजब हालत थी, मोबाइल रिचार्ज हो नहीं सकता और मैं किसी को मदद के लिए कॉल कर नहीं सकता। थककर मैं चाय की दुकान पर बैठा। चाय की पहली घूंट भीतर गई तो ध्यान आया कि ई मेल से मदद मांगी जाए। लैपटॉप साथ था, दिल्ली रवाना होने से पहले आनंद भाई का डोंगल मिल गया था। उसका इस्तेमाल किया। शाम के पांच बज रहे थे। दिवस चतुर्वेदी और रोहित मिश्रा को ई मेल किया। कोई रिप्लाई नहीं आया तो अमर उजाला के अपने वरिष्ठ साथी ऋषि भाई साहब को ई मेल किया। उनका तुरंत रिप्लाई आया ‘ओके’। रिप्लाई देखकर राहत की सांस ली। मैने 50 रुपए के बैलेंस का अनुरोध किया था,  उन्होंने 200 डलवा दिए। हालांकि इसके बाद रोहित और दिवस की मदद भी प्राप्त हुई लेकिन मेरी मुश्किल खतम नहीं हुई। वापस हैबिटेट सेंटर पहुंचा तो चला कि टीम रवाना हो चुकी थी और मेरा रीइम्बर्समेंट भी नहीं बन पाया। खैर मैने आयोजकों को फोन किया तो उन्होंने मेरा चेक लखनऊ भेजने का भरोसा दिलाया। मुझे कुछ राहत मिली लेकिन नियती से जंग जारी थी। मैं मेट्रो से राजीव चौक पहुंचा तो देखा कि मेरा वह मोबाइल गायब है, जिसके बैलेंस के लिए मैं जूझ रहा था। मेरा नोकिया लूमिया चोरी हो चुका था और जो मोबाइल मेरे पास बचा था, उसमें अब भी नेटवर्क नहीं था। यानी सुबह से शाम तक जब तक दिल्ली में रहा, अपनों से दूर रहा।
 
 
 

Tuesday, 12 August 2014

साहब के मातहत भी रहेंगे एसी में, मरीजों को पंखे भी नसीब नहीं

रणविजय सिंह, लखनऊ
केजीएमयू प्रशासन को यहां भर्ती होने वाले मरीजों से ज्यादा अपने कर्मचारियों की सुविधाओं की चिंता है। जहां मरीजों को पंखे भी नसीब नहीं होते वहीं वीसी ऑफिस, फाइनेंस ऑफिसर के ऑफिस और रजिस्ट्रार ऑफिस के कर्मचारियों के लिए एसी लगाए जा रहे हैं। पल्मनरी मेडिसिन विभाग में भर्ती मरीजों को घर से पंखा लाना पड़ रहा है। विभाग के वार्ड में कहीं तो पंखे लगे ही नहीं और जहां लगे हैं उनमें से कई खराब पड़े हैं। मरीजों की इस दिक्कत से बेपरवाह अधिकारियों को कर्मचारियों की ही चिंता है। लिहाजा गर्मी बीतने के बाद भी उनके कमरों में एसी लगाया जा रहा है। केजीएमयू कर्मचारी संघ की तरफ से इस पर नाराजगी जताई जा रही है। संघ का कहना है कि केवल प्रशासनिक भवन के कर्मचारियों के लिए हो रही इस व्यवस्था का विरोध किया जाएगा।

मिलीभगत के आरोप

कर्मचारी संघ के अध्यक्ष रजित राम का आरोप है कि गर्मी बीतने के बाद एसी क्यों लगाए जा रहे हैं। उनका दावा है कि करीब 40 एसी खरीदे गए हैं। इनका आने वाले आठ महीनों तक कोई खास इस्तेमाल नहीं होगा। ऐसे में इनकी वारंटी का भी पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाएगा। केजीएमयू के अधिकारी कंपनियों के साथ मिलीभगत कर ऐसा करते हैं।

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प्रशासनिक भवन में तैनात कर्मचारियों की तरफ से एसी लगाने का अनुरोध किया गया था। कंटीजेंसी के मद से एसी के लिए बजट दिया गया है। जिन विभागों में पंखे या कूलर नहीं हैं, उनके विभागाध्यक्ष की तरफ से पत्र आएगा तो वहां भी व्यवस्था कराई जाएगी।
- स्मृति लाल यादव, वित्त अधिकारी, केजीएमयू

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Wednesday, 15 February 2012

क्या आप एक वोट नहीं दे सकते ?

रणविजय सिंह 
लखनऊ, 15 फरवरी : मौसम की तमाम चुनौतियों के बीच लगातार हो रही गोलाबारी। तूफान के थपेड़े हों या दुश्मनों की गोलियां, हर वार सीने पर झेलते हुए देश के कई सपूतों ने अपनी आहुति दी। शहीद होती आंखों में जिस भारत का सपना था, उसे पूरा करने की जिम्मेदारी अब मतदाताओं के कंधों पर है। विशेषकर युवाओं के। राजधानी के कई आंगन अपनी यादों में आज भी उन शहीदों के सपनों को संजोए हुए हैं। एक उम्मीद के साथ, कि जिस देश के लिए उनके लाल ने अपनी जान दे दी, उसके लिए इस देश के बेटे क्या एक वोट नहीं दे सकते? 
           परमवीर चक्र विजेता शहीद कैप्टन मनोज कुमार पांडेय (23) के पिता गोपीचंद पांडेय को तीन जुलाई 1999 की तारीख कभी नहीं भूलती। इसी दिन उन्हें बेटे की शहादत की सूचना मिली। चर्चा के बीच आंखों की नमी पोंछते हैं। यादों की पोटली टटोलते हुए कहते हैं कि मनोज को मतदान के सहारे व्यवस्था परिवर्तन पर पूरा भरोसा था। वह अक्सर कहता था कि देश और समाज की भाग्य विधाता जनता ही है। उसके हाथ में वोट की ताकत है, बस जरूरत है उसके सही इस्तेमाल की। कारगिल की पहली शहादत सुनील जंग (22) के रूप में 15 मई 1999 को हुई। 64 वर्षीय उनके पिता सूबेदार नर नारायण जंग अस्वस्थ हैं। खांसते हुए कहते हैं कि 19 को मतदान है, हर हाल में वोट डालने जाऊंगा। मेरे बेटे ने जिस देश के लिए सीमाओं पर पांच वर्ष लगातार जूझते हुए बिता दिए, उसके लिए मैं कुछ घंटे तो लाइन में खड़ा हो ही सकता हूं। एक वोट के सहारे बदलाव की उम्मीद शहीद नवनीत राय (22) के पिता दिनेश नारायण राय के सीने में भी है। कहते हैं कि बेटा स्वस्थ राजनीति को बदलाव का वाहक समझता था। छात्र राजनीति में भी सक्रिय रहा लेकिन सेना उसकी प्राथमिकता थी। कारगिल के दौरान कुपवाड़ा में 29 जनवरी 2001 में आतंकवादियों का सामना करते हुए शहीद हुआ। बेटे को याद करते हुए कहते हैं कि अन्ना हजारे के आंदोलन से उम्मीद बंधी है। उनको मिला समर्थन अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ वोटों की शक्ल अख्तियार कर ले तो व्यवस्था की गंदगी दूर हो सकती है। शहीद परिवारों का कहना है कि बदलाव के लिए बंदूक उठाने की जरूरत नहीं, उसके लिए बस पोलिंग बूथ तक जाकर वोट करना ही काफी होता है।

Monday, 13 February 2012

किसानों के खेतों पर वोटों की फसल


                                      रणविजय सिंह
लखनऊ, 12 फरवरी : गेहूं कट चुका था। किसान खरीफ की तैयारी में लगे हुए थे। इसी बीच एक खबर से किसानों के पैर ठिठक गए। कई अखबारों में लखनऊ औद्योगिक विकास प्राधिकरण के लिए सरोजनीनगर की जमीनों के अधिग्रहण की सूचना छपी। विरोध का स्वर मुखर भी नहीं हुआ था कि क्षेत्र में यह चर्चा आम हो गई कि जमीन न देने वाले किसानों से सरकार जबरन भूमि ले लेगी। फिर क्या था, आनन-फानन संगठन खड़ा हुआ और संघर्ष की रणनीति बन गई। सभी सियासी दलों से सहयोग मांगा गया। ऐन वक्त पर बसपा प्रत्याशी ने चुनाव की खेती में इस मुद्दे पर वोटों की फसल काटी। जीतकर विधानसभा पहुंचे, लेकिन मुड़कर पीछे नहीं देखा। किसान ठगे से रह गए। इन चुनावों में वह प्रत्याशी मैदान में नहीं हैं, लेकिन किसान उसी जगह खड़ा है।
छह वर्ष पहले (2006) प्रदेश सरकार ने लखनऊ औद्योगिक विकास प्राधिकरण के लिए जमीन अधिग्रहण का निर्णय लिया। इसके लिए लखनऊ और उन्नाव के करीब 90 गांवों के करीब 40,000 से ज्यादा किसानों की खेतिहर जमीन ली जानी थी। जानकारी मिलने पर किसानों के विरोध पर वार्ताओं का दौर शुरू हुआ। सरकार डीएम सर्किल रेट पर मुआवजा दे रही थी, जबकि किसान बाजार भाव चाह रहे थे। वार्ताओं में एक वर्ष बीत गया और इसी बीच विधानसभा चुनाव आ गया। प्रोजेक्ट समाजवादी पार्टी की सरकार में आया था लिहाजा बहुजन समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी इरशाद खां ने इसे मुद्दा बनाकर किसानों से 33 लाख रुपये प्रति बीघा दिलवाने का वादा किया। इसका असर भी हुआ, वे विधायक बन गए, लेकिन मुआवजा नहीं बढ़ा। पुरानी दरों पर ही अधिग्रहण के प्रयासों का किसानों ने एक बार फिर संगठित होकर विरोध किया। तमाम प्रयासों के बावजूद सरकार केवल कुडौनी ग्राम सभा की जमीन ही ले सकी है। इस विधानसभा चुनावों में एक बार फिर किसान इस मुद्दे पर संगठित हैं। उनके वोट परिणाम पर असर डालेंगे। इस बात से सभी दल परिचित हैं, लिहाजा पांच वर्ष तक किसानों से दूरी बनाने वाले नेता भी उनकी दहलीज पर चक्कर लगा रहे हैं। तमाम वादों और दावों के बीच किसान खामोश हैं। शायद उसके बंद लबों में छुपा फैसला ईवीएम मशीन के जरिए बाहर आए।
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औद्योगिक विकास से हमारा कोई बैर नहीं है, लेकिन सरकार और व्यवस्था में शामिल लोगों की नीयत पर विश्र्वास करना मुश्किल है। राजधानी के 70 प्रतिशत औद्योगिक इकाइयों में से ज्यादातर बंदी की कगार पर हैं। ऐसे में खेती योग्य जमीनों का अधिग्रहण वो भी औने पौने दामों पर नहीं होने देंगे। खेत देने के बाद रोजगार की भी व्यवस्था होनी चाहिए। 
मनोज सिंह, 
अध्यक्ष लखनऊ औद्योगिक विकास प्राधिकरण किसान संघर्ष समिति
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प्रभावित क्षेत्र
 बंथरा, नरकुर, तिनवर, कुडौनी, बीबीपुर, भावापुर, खसवारा, पहाड़पुर, वखतखेड़ा, सराय शाहजादी, दादूपुर, औरावां, रामचौरा, गढ़ी चुनौटी, भटकांव, बेती, हरौनी, लतीफ नगर, रहीमनगर, पडि़याना, बनी, मेमोरा समेत करीब सरोजनीनगर के 45 गांव।

Saturday, 11 February 2012

आपन वोट खराब तौ नाई करब

रणविजय सिंह 
लखनऊ, 9 फरवरी : सियासी दलों के वादों से ऊबे लेकिन गांव के विकास की आस नहीं टूटी। नेताओं पर भरोसा खत्म हुआ, लेकिन लोकतंत्र से विश्र्वास नहीं डिगा। 55 वर्ष पहले जिस विकास की आस में पहली बार वोट डाला था वह आज भी पूरी नहीं हुई। चुनाव दर चुनाव दल और प्रत्याशियों ने सड़क, बिजली, पानी के वादे किए और भूल गए। क्षेत्र की लगातार हुई उपेक्षा के बावजूद 74 वर्षीय रामअवतार को अपने वोट की ताकत पर भरोसा है। लड़खड़ाती हुई लेकिन उम्मीद भरी आवाज में कहते हैं वोट तो देनै है, आपन वोट खराब तौ नाइ करब..। बुजुर्ग रामअवतार सरोजनीनगर विधानसभा क्षेत्र स्थित मोहिनीखेड़ा के निवासी हैं। करीब पांच सौ की दलित आबादी वाले इस इलाके के लिए बिजली, पानी और सड़क आज भी किसी सपने से कम नहीं। शहरी क्षेत्र की सीट होने के बावजूद संपर्क मार्ग के नाम पर यहां कच्ची पगडंडी और जलापूर्ति के लिए केवल एक हैंडपंप है। गांव की जो सूरत 50 वर्ष पहले थी आज भी करीब-करीब वैसी ही है। आजादी के इन वर्षो में विकास से अछूता रहने वाला सरोजनीनगर का मोहिनीखेड़ा अकेला मजरा नहीं है। रहीमनगर पडि़याना के नेवाली खेड़ा, महेंद्र, त्रिलोचन खेड़ा और सैतापुर भी वर्षो से उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं। हर मजरे की आबादी दो से पांच सौ है। जीत हार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बावजूद यह क्षेत्र लगातार उपेक्षित रहे, बावजूद इसके यहां मतदान को लेकर उत्साह में कोई कमी नहीं आयी। कानुपर रोड स्थित बदालीखेड़ा में विकास कार्यो की उपेक्षा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि स्थानीय निवासी इसे बदहाली खेड़ा कहने लगे हैं। दशकों बाद भी क्षेत्रवासियों को पक्की सड़क नसीब नहीं हुई। जो है वह गढ्डों और जलभराव में लगभग गायब सी हो चुकी हैं। वादों के बावजूद यहां सीवेज लाइन नहीं बिछ सकी। यही सूरत बल्दी खेड़ा और खेड़वा की भी है। पिछले 50 वर्षो में यहां एक सार्वजनिक शौचालय भी नहीं बन सका। यहां के निवासी खुले में शौच करने को मजबूर हैं। चारों तरफ कॉलोनियों से घिरे इन दोनों गांव पूरी तरह विकास से महरूम हैं। सई नदी के किनारे रौतापुर, बरबौता और सैदपुर पुरही में एक बार फिर विकास के नाम पर वोट मांगा जा रहा है। बुजुर्ग रामअवतार समेत इन क्षेत्रों के सभी नागरिक दल और प्रत्याशियों के वादों को शंका की निगाह से देख रहे हैं। इसके बावजूद दिल में कहीं वोट के सहारे बदलाव की उम्मीद बाकी है। मोहिनीखेड़ा के ज्यादातर मतदाताओं का कहना है वोट तो जरूरै देब, तबै त विकास होई।

Wednesday, 25 January 2012

आंचल में है दूध और आंखों में पानी

रणविजय सिंह लखनऊ, 22 जनवरी : अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आंचल में है दूध और आंखों में पानी।। पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं की दयनीय दशा का चित्र प्रस्तुत करते हुए एक कवि ने दशकों पहले ये लाइनें लिखी थीं। यह आज भी कितनी प्रासंगिक हैं, इसकी एक झलक मिलती है संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआइ) के किडनी प्रत्यारोपण विभाग में। यहां करीब 80 प्रतिशत अंगदाता महिलाएं हैं, उनमें भी साठ प्रतिशत पत्‍ि‌नयां लेकिन जिन पत्‍ि‌नयों का यह महादान भी उनके पतियों का जीवन नहीं बचा पाता, उन्हें प्रताड़ना मिलती है। परिवार दुखियारी महिला को देखना तक गवारा नहीं करता। यही नहीं घर की चौखट से धकेलने से भी गुरेज नहीं करता। सूबे में किडनी प्रत्यारोपण का एकमात्र संस्थान एसजीपीजीआइ है। किडनी की बीमारी से पीडि़त विमला (बदला हुआ नाम) के पति का प्रत्यारोपण भी यहीं होना था। आठ महीनों बाद नवंबर 2011 में ऑपरेशन हुआ तो कोई रिश्तेदार मदद को नहीं आया। सास ससुर भी मुंह मोड़े रहे। विमला ने अपने दम पर इलाज करवाया और अपनी किडनी भी दी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। उसका यह महादान भी पति का जीवन न बचा सका। इसके बाद तो जैसे विमला पर दुखों का पहाड़ ही टूट पड़ा। ससुराल वालों ने मौत के लिए उसे ही जिम्मेदार ठहरा दिया। दिन-ब-दिन परिवार वालों के ताने और उत्पीड़न बढ़ता गया। पति की मौत हुए महीना भी नहीं बीता था कि सबने उसे संपत्ति से बेदखल कर घर से निकाल दिया। दो बच्चों के साथ बेसहारा विमला सड़क पर आ गई। ऐसे में एसजीपीजीआइ ने सहारा दिया। नाबालिग बच्चों के साथ उसका गुजारा चल सके इसके लिए उसे संविदा पर नौकरी देने की तैयारी चल रही है। संस्थान में यह कोई पहला मामला नहीं है, इससे पहले करीब पांच महिलाओं को ठीक ऐसी ही परिस्थितियों में संविदा पर नौकरी दी जा चुकी है।

तो क्या बड़े अस्पताल मरीज को भर्ती कर डकैती डालने पर आमादा हैं

समय रहते रजनीश ने अपने नवजात शिशु को अपोलो मेडिक्स से जबरन डिस्चार्ज न कराया होता तो मुझे आशंका है कि 15 से 20 लाख रूपए गंवाने के बाद भी अपन...