Friday, 25 January 2019

जड़ समेत बरगद के 4 टुकड़े किए, चारों से बनाए नए पेड़



(रणविजय सिंह, पार्ट टू, 23 दिसंबर 2018)

लखनऊ : 'आप जुर्माना लगा दीजिए या मशीन सीज करवा दें, मैं काम नहीं कर सकता...'। इतना कहते हुए सरदार जी क्रेन के ड्राइवर को साथ लेकर डिपो से बाहर निकल गए। 'सर... एक क्रेन पहले ही जमीन में धंस चुकी है। बड़ी तलाश के बाद कानपुर से किसी तरह क्रेनें मंगवाईं थीं। अब अगर ये भी चली गईं तो काम कैसे होगा? पेड़ भी एक-दो नहीं 900 से ज्यादा हैं'। पर्यावरण अभियंता ने यह कहते हुए चीफ इंजिनियर की तरफ मायूसी से देखा। सबको परेशान देख उद्यान अधिकारी बोले, एक उपाय है लेकिन...। चीफ इंजिनियर ने पूछा, लेकिन क्या? उद्यान अधिकारी बोले, 'यह तरीका इतने पुराने और वजनी पेड़ों पर कीाी इस्तेमाल नहीं हुआ। इसलिए गारंटी नहीं ले सकता पेड़ बचाया जा सकेगा।
डिपो से लेकर चारबाग तक 120 से 130 टन तक के पेड़ निकालकर दूसरी जगह लगाए जाने हैं। इन्हें बचाना भी है। इस कोशिश में डिपो के भीतर दो क्रेनें धंस चुकी हैं। इसके बाद कोई दूसरा क्रेन मालिक आने को तैयार नहीं। हमारी क्रेन 130 टन के पेड़ जड़ समेत उठाकर ले जाने में सक्षम नहीं हैं। चीफ इंजिनियर ने एक सांस में सारी परेशानी उद्यान अधिकारी के सामने रखते हुए उपाय बताने को कहा। उद्यान अधिकारी के उपाय पर किसी को यकीन नहीं हुआ कि इसके बाद पेड़ बचेगा भी या नहीं। कोई और रास्ता नहीं सूझने पर चीफ इंजिनियर ने बताए गए तरीके से काम करने की मंजूरी दे दी।

अनिष्ट की आशंका में छंटाई को तैयार नहीं थे कर्मचारी :
योजना पर काम शुरू भी नहीं हुआ था कि नई समस्या आ गई। सुपरवाइजर ने बताया कि अनिष्ट की आशंका में कोई भी कर्मचारी पीपल के पेड़ों की टहनियां काटने को तैयार नहीं है। बिना कुछ बोले चीफ इंजिनियर कर्मचारियों की तरफ चल पड़े। पीपल के पेड़ के पास जमीन पर बैठे कर्मचारी उन्हें देखते ही हाथ जोड़कर खड़े हो गए। चीफ इंजिनियर ने समझाया, 'आप लोग पीपल काट नहीं रहे, बल्कि उसे बचा रहे हैं। टहनी नहीं कटेगी तो पूरा पेड़ काटना पड़ेगा। बचाने के लिए हल्का किया जाना जरूरी है। इसके बाद निकालकर शनि मंदिर के पास लगाया जाएगा। पेड़ कटने से बचेगा पाप नहीं पुण्य मिलेगा'। कर्मचारियों को बात समझ आ गई और छंटाई शुरू हो गई। हालांकि बरगद को हटाना अब भी सिरदर्द बना हुआ था। डिपो से लेकर टीपी नगर और चारबाग के बीच तमाम ऐसे पेड़ थे, जिन्हें बिना काटे, दूसरी जगह लगाना चुनौती था।
पहली बार जड़ समेत पेड़ के टुकड़े कर बचाया
चीफ इंजिनियर की मंजूरी के बाद उद्यान अधिकारी ने वह काम शुरू किया जो अब तक केवल किताबों में पढ़ा था। टहनियां कटवाने के बाद पेड़ का वजन करीब 130 टन आंका गया। पेंड़ के तने का व्यास करीब सात फुट था। तने के एक मीटर दायरे में जड़ की तरफ जमीन पर निशान लगाया गया। इसके बाद आधे हिस्से में दो से तीन मीटर तक खोदाई की गई। इसके बीच आने वाली जड़ों को काटा जाता रहा और उन्हें बचाने के लिए प्लांट हार्मोंस ऑक्सिन का लेप लगाया जाता रहा। इसमें 15 दिन लगे। इसके बाद यही कवायद बचे आधे हिस्से में की गई। चारों तरफ से जड़ समेत खोदाई होने और कटी जड़ों पर हार्मोंस के लेप के बाद बोरी से बांधकर 5 से 10 दिन के लिए छोड़ दिया गया। इसके बाद इस तने को ऊपर से लंबाई में जड़ तक चार टुकड़े में काटा गया। सभी हिस्सों पर प्लांट हार्मोंस ऑक्सिन का लेप किया गया। इसके बाद सामान्य क्रेन से टुकड़ों को डिपो की बाउंड्री के पास पहले से बनाए गए गड्ढे में लगाया गया। करीब छह महीने तक देखभाल की गई और चारों टुकड़े नए पेड़ बन गए।

डर के आगे जीत है :
पहले जिस पेड़ को बचाना मुश्किल लग रहा था, वहीं चार जगह हरियाली फैला रहा है। चीफ इंजीनियर समेत डिपो में मौजूद अधिकारियों के लिए भी यह किसी अजूबे से कम नहीं था। इसके बाद चीफ इंजिनियर ने उद्यान अधिकारी और वन अधिकारी को बुलाकर पूछा 'यह बताओ कि तुमने पहले से ही योजना बना ली थी या मौके का इंतजार कर रहे थे'। वन अधिकारी ने मुस्कुराते हुए कहा कि पहले ही सर्वे कर पेड़ों की नम्बरिंग कर ली थी। इसमें पेड़ों की उम्र, प्रजाति और मौसम देखकर दूसरी जगह लगाने की संभावनाओं को भी परख लिया था। कुछ देर चुप रहने के बाद चीफ इंजिनियर की तरफ रिपोर्ट बढ़ाते हुए कहा, इस प्रॉजेक्ट में टीपीनगर डिपो से चारबाग तक के रूट में 981 पेड़ काम के आड़े आ रहे थे। इनमें पीपल, बरगद, कचनार, मौलश्री, चितवन, टीक, कंजी और सेमल जैसे पेड़ थे। सभी पेड़ों को बचा लिया गया।

जरा सी चूक से उड जाती टीपी नगर की सड़क और ग्रीन गैस पंप

(रणविजय सिंह, पार्ट थ्री, 27 दिसंबर 2018)
आप समझ नहीं रहे हैं... रिग मशीन का जरा सा झटका लगेगा और टीपी नगर से अमौसी तक की ब्लास्ट होने लगेंगे। आसपास की इमारतें भी गिर सकती हैं... पूरे लखनऊ की सप्लाई ठप हो जाएगी सो अलग... फैसला आप लोगों को लेना है। इतना सुनते ही एलएमआरसी टीम के साथ आए आला अधिकारी सकते में आ गए... पूछा, 'क्यों भाई? क्या नीचे बारूद बिछा हुआ है'। अफसरों के चेहरे पर प्रॉजेक्ट लेट होने की आशंका और समय पर काम पूरा करने का दबाव साफ झलक रहा था। मामले को संभालने की कोशिश करते हुए साइट पर मौजूद इंजिनियर ने जवाब दिया...'सर, बारूद नहीं, लेकिन ग्रीन गैस की पाइप लाइन बिछी है, जो अमौसी के पंप से जुड़ी है। इसी लाइन से पूरे लखनऊ में ग्रीन गैस की सप्लाई होती है...। हमारी पाइलिंग ठीक इसके ऊपर है, रिग मशीन एक बार में जमीन के नीचे एक से डेढ़ मीटर तक खोद देती है...ऐसे में मशीन दायरे में आने पर ग्रीन गैस की पाइप का फटना तय है'।
इतना बोलकर इंजीनियर चुप हो गए और चारों तरफ सन्नाटा छा गया। चुप्पी तोड़ते हुए एलएमआरसी टीम के साथ आए अफसर ने लगभग चीखते हुए पूछा, ...तो इस पाइप लाइन को अब तक हटवाया क्यों नहीं गया? इस सवाल पर इंजिनियरों का जवाब सुनकर अफसरों के होश उड़ गए। उन्होंने कहा जमीन के नीचे पाइपों में ग्रीन गैस भरी हुई है, एजेंसी इसे शिफ्ट करने की मंजूरी देने को तैयार नहीं है, पाइप लाइन कितनी गहरायी पर है? यह भी उन्हें नहीं पता। पाइपों में गैस की मात्रा और लोकेशन भी एजेंसी साझा करने को तैयार नहीं है। इतना कहकर एक बार फिर इंजिनियर समाधान की आस में अफसरों का चेहरा देखने लगे। कुछ देर सोंचकर अफसरों ने एहतियात के साथ खोदायी के विकल्प पर विचार करते हुए पूछा कि हादसा होने पर बचाव के उपाय क्या हैं? जवाब मिला कि ग्रीन गैस की तरफ से ऐसे टिप्स या उपाय बताने में भी असमर्थता जता दी गई है। इतना सुनने के बाद टीपी नगर स्टेशन का काम अटकने की आशंका में अफसरों के चेहरे का रंग ही उड़ गया...।
नहीं हारे हिम्मत
ग्रीन गैस के साथ सामंजस्य के सारे रास्ते बंद होने के बाद सिविल इंजिनियरों की टीम ने समाधान का उपाय खोजना शुरू किया। चीफ इंजिनियर और अधिकारियों की घंटों की माथापच्ची के बाद तय हुआ कि अगर ग्रीन गैस की तरफ से पाइप लाइन की लोकेशन नहीं मिल रही तो एलएमआरसी खुद खोजेगा। इसके बाद भी समस्या का पूरा समाधान नहीं हुआ, क्योंकि लोकेशन मिलने के बाद भी पाइप लाइन हटाने के लिए ग्रीन गैस ने एनओसी देने से इनकार कर दिया। लेकिन कहते हैं कि जहां चाह वहां राह। एलएमआरसी ने भी काम करने की ठान ली थी। एक बार फिर मेट्रो ने ग्रीन गैस के अफसरों से बात करने पर डिजाइन और जमीन के नीचे पाइप लाइन की पहचान करने वाला लोकेटर मुहैया करवा दिया गया। हालांकि इस मशीन से भी जमीन के नीचे केवल दो मीटर तक की ही जानकारी मिल पा रही थी। ऐसे में जेसीबी से जमीन को दो मीटर तक खोदने के बाद गड्ढा बनाया गया। इसके बाद उसमें लोकेटर रखकर पाइप का पता लगाया गया और पाइप लाइन मिलने तक रिग मशीन के बजाय कर्मचारियों से करवाई।
ब्रिज तकनीक
एलएमआरसी टीम और सिविल इंजिनियरों ने समाधान के तौर जमीन के नीचे ब्रिज तकनीक का इस्तेमाल कर पाइलिंग करने का फैसला किया गया। देश के शायद ही किसी दूसरे मेट्रो प्रॉजेक्ट में इस तकनीक से पाइलिंग हुई होगी, लेकिन विवाद से बचते हुए समय पर काम करने के लिए दूसरा कोई चारा भी नहीं था। जमीन के नीचे 25 मीटर गहरायी तक पाइलिंग की गई लेकिन ग्रीन गैस के पाइप वाले हिस्से के चारों तरफ ब्रिज तकनीक के जरिए खाली छोड़ दिया गया। इसके लिए पाइलिंग के मूल डिजाइन में आंशिक बदलाव किया गया।

दलदली जमीन पर सैकड़ों टन की मशीनें चला डिपो बनाने की थी चुनौती

(रणविजय सिंह, पार्ट वन, 20 दिसंबर 2018)

लखनऊ: 'एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा' बुदबुदाते हुए मेट्रो डिपो के चीफ इंजिनियर हाथ बांधकर इधर से उधर टहलने लगे। उन्हें परेशान देख इंजिनियरों से चुप नहीं रहा गया। वे पूछ बैठे, 'क्या हुआ सर? अब क्या समस्या आ गई?' यह सुनकर चीफ इंजिनियर ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया 'अभी पता चला है कि डिपो के लिए जो जमीन मिली है, उसका बड़ा हिस्सा दलदली है। सैकड़ों टन की मशीनें उसके आसपास भी गईं तो जमीन भी धंस जाएगी।'
'पूरी तरह से खाली जमीन पर डिपो बनाने में औसतन दो साल लगता है, लेकिन हमें एक साल में काम पूरा करना है। इसके बावजूद हमें पीएसी की वह जमीन दी गई है, जिस पर पहले से स्कूल, मकान, मंदिर और ऑफिस बने हैं। इन्हें भी एक तरफ से तोड़ने के बजाय हमें पीएसी के लिए ये इमारतें दूसरी जगह बनाकर देनी हैं। इसके बाद यहां लगे पेड़ों को भी काटने के बजाय उन्हें जड़ समेत निकालकर दूसरी जगह लगाना है। यह सब करते हुए भी दो साल का काम हम एक साल में करने की तैयारी कर रखी थी लेकिन...'। एक सांस में ही यह सब बताने के बाद चीफ इंजिनियर कुछ देर रुके और फिर बोले, '...और अब पता चल रहा है कि जमीन भी दलदली है।'
डिपो की डिजाइन में बदलाव कर अहम इमारतों को जमीन के दलदली हिस्से के बजाय दूसरी जगह शिफ्ट किया जा सकता था, लेकिन उसके लिए भी समय नहीं था। इस बीच 15 जून 2015 को काम शुरू करने का ऐलान हो गया। एक सप्ताह तक सोच-विचार के बाद हुई बैठक में अचानक चीफ इंजिनियर आए और बोले 'डिजाइन के मुताबिक जिस जमीन पर जो इमारत बननी है, वह वहीं बनेगी।' इससे पहले कि कोई कुछ समझता, उन्होंने जमीन का जियोलॉजिकल सर्वे करवाने के अलावा तहसीलदार और इंजिनियरों को जमीनों की दोबारा पैमाइश करने को कहा।
अगले दिन चीफ इंजिनियर के दफ्तर पहुंचने से पहले ही टेबल पर पूरी रिपोर्ट पड़ी थी। साथी इंजिनियरों के बीच उन्होंने बुदबुदाते हुए रिपोर्ट पढ़ी, '46 एकड़ कुल जमीन में से नौ एकड़...' इतना सुनते ही सामने बैठे इंजिनियर ने कहा, 'मतलब करीब 20 फीसदी जमीन तो दलदली ही है। रिपोर्ट दोबारा टेबल पर रखते हुए उन्होंने 15 दिन के भीतर दलदली हिस्से की खोदाई कर वहां बालू से भरने को कहा। इसके बाद जेसीबी लगाकर 15 दिन में दलदली जमीन की खोदाई की गई और 30 ट्रक से ज्यादा बालू भरी गई। फिर कच्ची मिट्टी डाली गई। इसके बाद भी डिपो में रिसीविंग सब स्टेशन के लिए तय जमीन इतनी मजबूत नहीं हो सकी कि वहां भारी मशीनें चढ़ाई जा सकें।
अब क्या करें? साथी इंजीनियरों के इस सवाल पर चीफ इंजिनियर ने कहा, 'अब इस पूरी जमीन पर कंक्रीट पाइलिंग करनी होगी। 5000 वर्ग फुट से ज्यादा क्षेत्रफल में कंक्रीट की चादर बिछानी पड़ेगी।' यब सुनकर बगल में खड़े इंजिनियर बोल पड़े, '...लेकिन यह तकनीक तो एलेवेटेड रूट पर पिलर्स को मजबूती देने में इस्तेमाल होती है। आज तक किसी भी मेट्रो प्रॉजेक्ट के डिपो में इसका इस्तेमाल नहीं सुना।' इसके बाद काम शुरू हुआ और एक महीने बाद पूरे डिपो में अफसरों ने सैकड़ों टन की मशीनों को दौड़ते देखा। प्रॉजेक्ट में देरी की आशंका से घबराए इंजिनियरों को काम होने के बाद चीफ इंजीनियर ने बुलाया और बोले कि 'मैं न कहता था कि ऐसा कुछ नहीं जो इंजिनियर न बना सके।' इतना सुनते ही सबके चेहरे पर मुस्कान बिखर गई।

Friday, 21 December 2018

आम आदमी की सड़क, नाली खंडजा के बजट से लामार्ट्स में बनवा दिया स्वीमिंग पूल


रणविजय सिंह, लखनऊ : सड़क, नाली और खड़ंजे के लिए आए बजट से एलडीए के पूर्व उपाध्यक्ष और इंजिनियरों ने लामार्टिनियर गर्ल्स कॉलेज में ऑडिटोरियम, लिफ्ट, सीसीटीवी सिस्टम, फायर अलार्म और ऑल वेदर स्वीमिंग पूल बनवा दिया। मामले का खुलासा इकॉनमिक ऐंड रेवेन्यू सेक्टर ऑडिट के महालेखाकार की जांच में हुआ। ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि एलडीए अधिकारियों ने तत्कालीन प्रदेश सरकार के निर्देश पर यह काम करवाने की बात कही है, जिसे ऑडिट टीम ने खारिज कर दिया है। ऑडिट टीम के मुताबिक आम जनता के लिए जारी हुई समग्र विकास निधि से निजी संस्था या उसकी इमारत में निर्माण कार्य करवाना किसी भी सूरत में जनहित में लिया गया फैसला नहीं माना जा सकता।
शासन से एलडीए को समग्र विकास निधि (आईडीएफ) के तौर पर मिले 45 करोड़ रुपये का करीब आधा हिस्सा लामार्टीनियर गर्ल्स कॉलेज पर खर्च कर दिया गया। ऑडिट आपत्ति से जुड़े दस्तावेज के मुताबिक एलडीए के पूर्व उपाध्यक्षों और इंजिनियरों ने 22 करोड़ रुपये केवल इस कॉलेज में लगा दिए। नियमों के मुताबिक आईडीएफ से होने वाले किसी भी काम को मंजूरी देने के लिए कमिश्नर की अध्यक्षता में कमिटी बनी हुई है। इस कमिटी में जिलाधिकारी, एलडीए उपाध्यक्ष, नगर आयुक्त शामिल होते हैं। इसके बावजूद इस पूरे काम को कमिटी के सामने नहीं रखा गया। ऊपर से मिले निर्देश के बाद तत्कालीन एलडीए उपाध्यक्ष ने इन कार्यों का एस्टीमेट बनाया और यह जानते हुए भी काम शुरू करवा दिया कि लामार्टिनियर एक निजी संस्था है और मिशनरीज द्वारा चलाई जाती है। रिपोर्ट के मुताबिक 1 जनवरी 2016 से लामार्टिनियर में शुरू हुआ काम सितंबर 2017 तक चला, जिसका खर्च एलडीए ने आईडीएफ से उठाया।
ऐसे हुआ खर्च
रु 2,74,63000 ऑडिटोरियम और ऑल वेदर स्वीमिंग पूल पार्ट-वन पर
रु 1,58,02,000 लाइटिंग, फायर फाइटिंग, फायर अलार्म, ऑडियो सिस्टम, सीसीटीवी और लिफ्ट पर
रु. 17,76,21,000 ऑडिटोरियम और ऑल वेदर स्वीमिंग पूल पार्ट-2
इन अफसरों के कार्यकाल के दस्तावेजों की हुई जांच
सत्येंद्र सिंह यादव : 28 अगस्त 2016 तक
अनूप यादव : 29 अगस्त 2016 से 23 दिसंबर 2016 तक
सत्येंद्र सिंह यादव : 24 दिसंबर 2016 से 18 अप्रैल 2017 तक
अनिल गर्ग : 19 अप्रैल 2017 से 8 मई 2017 तक
प्रभु एन सिंह : एक जनवरी 2017 से 20 जून 2017 तक
अभी मैंने आपत्तियां पढ़ी नहीं हैं। हालांकि बिना चीफ इंजिनियर की संस्तुति के समग्र विकास निधि से करवाए गए किसी भी काम का भुगतान नहीं हुआ होगा। रिपोर्ट देखने के बाद ही मैं इस बारे में ज्यादा विस्तार से बता सकूंगा।
-राजीव कुमार, वित्त नियंत्रक, एलडीए

अंधी कुतिया को बंधक बनाकर, देसी कुत्ते पकड़वाने की डिमांड


रणविजय सिंह, लखनऊ : 
रसूखदार की शिकायत पर देसी कुत्ते पकड़ने पहुंचे नगर निगम के कर्मचारियों को निराशा हाथ लगी तो वे इन कुत्तों को रोटी खिलाने वाली महिला की अंधी डॉगी (पॉमेरियन) को उठा ले गए। दो दिन से महिला और उसका बेटा डॉगी को छुड़ाने के लिए नगर निगम के चक्कर लगा रहा हैं, लेकिन अफसर उनसे पहले कुत्ते पकड़वाने को कह रहे हैं। महिला ने शनिवार को नगर निगम के मुख्य पशु चिकित्साधिकारी अरविंद राव, अपर नगर आयुक्त अनिल मिश्रा और नगर आयुक्त इंद्रमणि त्रिपाठी से मिलकर उन्हें अपनी कुतिया का टीकाकरण और पंजीकरण से जुड़े दस्तावेज भी दिखाए, लेकिन कोई राहत नहीं मिली।
अलीगंज के सेक्टर एल में रहने वाले एक रसूखदार को मुहल्ले में घूमने वाले देसी कुत्तों से परेशानी है। मुहल्ले में ही रहने वाली रेनू मिश्रा इन कुत्तों को रोज रोटी खिलाती हैं। इसे लेकर रसूखदार और रेनू मिश्रा के बीच कई बार नोकझोंक भी हो चुकी है। इस बीच रसूखदार ने नगर निगम अफसरों से शिकायत कर इन्हें पकड़ने का दबाव बनाया। इसपर नगर निगम की टीम ने बुधवार को मुहल्ले में छापा मारा। कैटल कैचिंग दस्ते को देखते ही कुत्ते भाग गए। इनमें से दो कुत्ते रेनू मिश्रा के घर में बैठे थे। नगर निगम की टीम उन्हें पकड़ने पहुंची तो रेनू मिश्रा ने दरवाजा खोलकर उनको भगा दिया। खाली हाथ लौटे कर्मचारियों को नगर निगम अफसरों ने फटकार लगाई तो गुरुवार को नगर निगम के कर्मचारी पुलिस के साथ रेनू मिश्रा के घर पहुंचे। उस समय वो घर पर नहीं थीं। उनके बुजुर्ग पिता ने दरवाजा खोला तो नगर निगम के कर्मचारियों ने भीतर सोई उनकी अल्सेशियन डॉगी को उठा ले गए। इसके बाद रेनू मिश्रा नगर निगम पहुंचीं, लेकिन कोई अधिकारी नहीं मिला। शुक्रवार को कोई अधिकारी नहीं मिला, लेकिन कर्मचारियों ने बताया कि मुहल्ले के देसी कुत्ते पकड़ने का ऊपर से काफी दबाव है। बिना उन्हें पकड़े, डॉगी को नहीं छोड़ा जाएगा। परेशान होकर रेनू शनिवार को अपर नगर आयुक्त से मिलीं, लेकिन कोई समाधान नहीं हुआ।
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मेरी डॉगी अंधी है। उसका टीकाकरण हो चुका है। बिना मेरे वो कुछ खाती नहीं है। इसके बाद भी उसे उठा ले गए। मैं शपथपत्र देने को तैयार हूं कि मुहल्ले के देसी कुत्तों को कुछ नहीं खिलाऊंगी।
-रेनू मिश्रा, पीड़िता
मुहल्ले में रेनू मिश्रा ने दर्जनों देसी कुत्ते पाले हुए हैं। इन्हें रोज दूध ब्रेड और रोटी खिलाती हैं। इससे मुहल्ले वालों को परेशानी है। उनके घर से जो कुतिया पकड़ी गई, उसका लाइसेंस मांगा गया है। लाइसेंस मिलते ही उसे छोड़ दिया जाएगा।
अनिल मिश्रा, अपर नगर आयुक्त, नगर निगम

Thursday, 29 November 2018

सीएसआर फंड से केवल बीजेपी पार्षदों के वार्ड में आएगी बहार

रणविजय सिंह, चार अक्टूबर, 2018
लखनऊ : नगर निगम के वॉर्डों में सड़क, बिजली और नालियां समेत दूसरे विकास कार्यों के लिए गेल इंडिया प्रालि. के महाप्रबंधक अनूप गुप्ता और मेयर संयुक्ता भाटिया के बीच एमओयू साइन हुआ। इसके तहत गेल इंडिया सोशल कॉरपोरेट रिस्पांसबिलिटी (सीएसआर) के तहत नगर निगम को दो करोड़ रुपये देगा। एमओयू के दस्तावेजों में उन 14 वॉर्डों की सूची भी लगी हुई है, जिनमें इस फंड से काम होना है। चौंकाने वाली बात यह है कि सूची में शामिल सभी वॉर्ड बीजेपी पार्षदों के हैं। आरोप है कि बीजेपी पार्षदों को पहले से इस फंड की जानकारी दी गई और केवल उन्हीं से प्रस्ताव लेकर एमओयू साइन कर लिया गया।
भारत की नवरत्न कंपनियों में शुमार गेल इंडिया और नगर निगम के बीच बुधवार को एमओयू हुआ है। इस बजट से होने वाले कामों की सूची और इसके लिए वॉर्डों के चयन पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। विरोधी दल के नेता यावर हुसैन रेशू ने आरोप लगाया है कि इस फंड से काम करवाने के लिए विरोधी दल के पार्षदों से न तो प्रस्ताव मांगे गए और न ही इसकी कोई सूचना ही दी गई। इस्माईलगंज प्रथम वॉर्ड के पूर्व पार्षद मुकेश सिंह ने एमओयू साइन होने के तुरंत बाद ही आरोप लगाया कि एमओयू के साथ लगी सूची में सभी नाम बीजेपी पार्षदों के हैं, लेकिन उनकी आपत्ति को अनसुना कर दिया गया। इसके तुरंत बाद ही विरोधी दल के नेता यावर हुसैन रेशू ने इस मामले को लेकर सभी विपक्षी पार्षदों की बैठक बुलाते हुए विरोध का ऐलान कर दिया है। चौंकाने वाली बात यह है कि बालागंज वॉर्ड में विकास कार्य करवाने का प्रस्ताव वर्तमान निर्दल पार्षद के बजाय बीजेपी के पूर्व पार्षद पंकज पटेल की तरफ से लिया गया।
सीएसआर फंड के तहत काम करवाने के लिए सभी पार्षदों से प्रस्ताव मांगे गए थे। सूची में केवल बीजेपी पार्षदों के नाम की जानकारी नहीं है। ऐसा हुआ है तो इस बारे में इंजिनियरिंग विभाग से पूछताछ की जाएगी। फंड के तहत अभी काफी पैसा आना है। ऐसे में बाकी पार्षदों से आने वाले प्रस्तावों को उस मद से बजट आवंटित किया जाएगा। -संयुक्ता भाटिया, मेयर

वार्ड                                                               पार्टी
यदुनाथ सान्याल गणेशगंज                                 बीजेपी
शीतलादेवी                                                     बीजेपी
कुंवर ज्योति प्रसाद                                           बीजेपी
आलमनगर                                                     बीजेपी
कॉल्विन कॉलेज निशातगंज                                बीजेपी
इंदिरानगर                                                      बीजेपी
जानकीपुरम द्वितीय                                          बीजेपी
लाला लाजपत राय                                            बीजेपी
हुसैनाबाद                                                       बीजेपी
बाबू जगजीवनराम                                           बीजेपी
अलीगंज                                                        बीजेपी
बालागंज                                                        बीजेपी
मैथिलीशरण गुप्त                                            बीजेपी
महानगर                                                       बीजेपी
बाबू बनारसीदास                                            बीजेपी

Thursday, 19 July 2018

घाटे का रोना रो रहे और 2000 रुपये हाउस टैक्स वालों से वसूल रहे 60 पैसा

(रणविजय सिंह, 11 मई)

- नगर निगम के करीब 50 हजार आवासीय और कमर्शल भवनों से वसूले जा रहे महज एक, दो और छह रुपये हाउस टैक्स
- टैक्स इंस्पेक्टरों ने नहीं किया असेस्मेंट, मामूली हाउस टैक्स जमा कर फायदा उठा रहे भवन स्वामियों पर होगी कार्रवाई

Ranvijay.Singh1@timesgroup.com, लखनऊ
एक तरफ नगर निगम घाटे का रोना रो रहा है और दूसरी तरफ जिन मकानों से 2000 रुपये हाउस टैक्स वसूला जाना चाहिए, उनसे महज 60 पैसे से लेकर छह रुपये तक का टैक्स जमा कराया जा रहा है। उपाध्यक्ष अरुण तिवारी के निर्देश पर एनआईसी से निकाली गई सूची में इसका खुलासा हुआ। सामने आए दस्तावेजों के मुताबिक ऐसे करीब 50 हजार भवन हैं, जिनके असेस्मेंट में मिलीभगत कर महकमे को हर साल करोड़ों का चूना लगाया जाता रहा। वर्षों से मामूली हाउस टैक्स जमा कर गलत तरीके से लाभ उठा रहे भवन स्वामियों के साथ इन इलाकों के टैक्स इंस्पेक्टरों के खिलाफ भी बड़े पैमाने पर कार्रवाई की तैयारी है।
जोन 1 और जोन छह की सूची सामने आने के बाद जोनल अफसर और टैक्स इंस्पेक्टरों ने इनके सत्यापन का काम तेज कर दिया है। उपाध्यक्ष अरुण तिवारी ने बताया कि इस सूची में मकान संख्या 163/219एफ की जांच करायी गई। चकमंडी स्थित इस भवन का क्षेत्रफल करीब 200 वर्गफीट है और इसमें कमर्शल गतिविधियां चल रही हैं। अनुमान के मुताबिक इसका हाउस टैक्स करीब 2000 रुपये होना चाहिए लेकिन दस्तावेजों में इसका टैक्स महज 60 पैसे दर्ज है। ऐसे ही मामले सप्रू मार्ग, मोहिनी पुरवा, दौलतगंज, करीमगंज, गऊघाट, पुल मोतीलाल, दिलराम बारादरी, जियामऊ, हैदरगंज, भवानीगंज, पुराना टिकैतगंज, मुंशीगंज, महताबबाग पार्ट 2, बरफ खाना, गढ़ी पीर खान, नेवाटी टोला, वजीरबाग, शाहमीना रोड़, मल्लाही टोला और वजीरबाग समेत दर्जनों इलाकों के नाम हैं। सूची में शामिल इन जोनों के मकानों से अब तक महज 60 पैसे से लेकर एक रुपये, एक रुपये 20 पैसे और छह रुपये तक का हाउस टैक्स जमा हो रहा है।


10 हजार मकानों की कुर्की करने की तैयारी :
सामने आयी सूची के मुताबिक करीब 10 हजार ऐसे लोग हैं, जिनका असेस्मेंट तो हो चुका है लेकिन पिछले दो साल से वो टैक्स जमा ही नहीं कर रहे हैं। ऐसे सभी भवन स्वामियों को  नोटिस देकर उनका मकान कुर्क करने की तैयारी है। उपाध्यक्ष अरुण तिवारी के मुताबिक इस संबंध में कर अधीक्षकों और जोनल अधिकारियों को निर्देश दिए जा चुके हैं।

अधिकारियों को देना होगा शपथपत्र :
टैक्स वसूली में लापरवाही सामने आने के बाद अब टैक्स वसूली में जवाबदेही तय कर दी गई है। जोनल अधिकारी, कर अधीक्षक और वार्ड निरीक्षकों को हर वार्ड से होने वाली वसूली का ब्योरा देना होगा। यही नहीं उन्हें इस बात का शपथपत्र भी देना होगा कि अब कोई मकान टैक्स के दायरे से बाहर नहीं है। इस बीच पिछले महीने ही इस साल टैक्स वसूली की टाइम लाइन भी जारी कर दी गई है।

यह है टाइम लाइन :
31 मई : सभी मकानों के हाउस टेक्स के बिलों का वितरण कर उसकी कॉपी वार्ड लिपिक को सौंपना।
1 जून : कर पुनरीक्षण की परिधि से छूटे हुए मकानों का कर पुनरीक्षण करना।
1 जून से 30 जून : सभी भवन स्वामियों से मिलकर उन्हें बिल सौंपना। कर अधीक्षक कम से कम 5 फीसदी बकाएदारों से स्वयं मिलेंगे।
1 जुलाई से 31 जुलाई : सभी राजकीय भवनों से कर वसूली और 10 हजार से ज्यादा धनराशि के बकाएदारों से संपर्क कर हाउस टैक्स जमा करवाना।
1 अगस्त से 15 अगस्त : कर निर्धारण की परिधि में उन मकानों को भी लाना, जो अब इससे छूटे हुए हैं।
15 अगस्त से 31 अगस्त : 10 हजार से अधिक बकाएदारों के खिलाफ कार्रवाई। बिल जमा ना होने पर कुर्की भी की जा सकती है।

टैक्स वसूली में बड़े पैमाने पर अनियमितता सामने आयी है। महज 60 पैसे और एक रुपया हाउस टैक्स कैसे तय हुआ? इसकी जांच करायी जाएगी। इसके साथ ही इस बार बड़े पैमाने पर टैक्स वसूली का अभियान चलाने की तैयारी है। जरूरत पड़ी तो टैक्स जमा ना करने वाले मकानों की कुर्की करायी जाएगी।
अरुण तिवारी, उपाध्यक्ष
नगर निगम

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