Thursday, 19 July 2018

घाटे का रोना रो रहे और 2000 रुपये हाउस टैक्स वालों से वसूल रहे 60 पैसा

(रणविजय सिंह, 11 मई)

- नगर निगम के करीब 50 हजार आवासीय और कमर्शल भवनों से वसूले जा रहे महज एक, दो और छह रुपये हाउस टैक्स
- टैक्स इंस्पेक्टरों ने नहीं किया असेस्मेंट, मामूली हाउस टैक्स जमा कर फायदा उठा रहे भवन स्वामियों पर होगी कार्रवाई

Ranvijay.Singh1@timesgroup.com, लखनऊ
एक तरफ नगर निगम घाटे का रोना रो रहा है और दूसरी तरफ जिन मकानों से 2000 रुपये हाउस टैक्स वसूला जाना चाहिए, उनसे महज 60 पैसे से लेकर छह रुपये तक का टैक्स जमा कराया जा रहा है। उपाध्यक्ष अरुण तिवारी के निर्देश पर एनआईसी से निकाली गई सूची में इसका खुलासा हुआ। सामने आए दस्तावेजों के मुताबिक ऐसे करीब 50 हजार भवन हैं, जिनके असेस्मेंट में मिलीभगत कर महकमे को हर साल करोड़ों का चूना लगाया जाता रहा। वर्षों से मामूली हाउस टैक्स जमा कर गलत तरीके से लाभ उठा रहे भवन स्वामियों के साथ इन इलाकों के टैक्स इंस्पेक्टरों के खिलाफ भी बड़े पैमाने पर कार्रवाई की तैयारी है।
जोन 1 और जोन छह की सूची सामने आने के बाद जोनल अफसर और टैक्स इंस्पेक्टरों ने इनके सत्यापन का काम तेज कर दिया है। उपाध्यक्ष अरुण तिवारी ने बताया कि इस सूची में मकान संख्या 163/219एफ की जांच करायी गई। चकमंडी स्थित इस भवन का क्षेत्रफल करीब 200 वर्गफीट है और इसमें कमर्शल गतिविधियां चल रही हैं। अनुमान के मुताबिक इसका हाउस टैक्स करीब 2000 रुपये होना चाहिए लेकिन दस्तावेजों में इसका टैक्स महज 60 पैसे दर्ज है। ऐसे ही मामले सप्रू मार्ग, मोहिनी पुरवा, दौलतगंज, करीमगंज, गऊघाट, पुल मोतीलाल, दिलराम बारादरी, जियामऊ, हैदरगंज, भवानीगंज, पुराना टिकैतगंज, मुंशीगंज, महताबबाग पार्ट 2, बरफ खाना, गढ़ी पीर खान, नेवाटी टोला, वजीरबाग, शाहमीना रोड़, मल्लाही टोला और वजीरबाग समेत दर्जनों इलाकों के नाम हैं। सूची में शामिल इन जोनों के मकानों से अब तक महज 60 पैसे से लेकर एक रुपये, एक रुपये 20 पैसे और छह रुपये तक का हाउस टैक्स जमा हो रहा है।


10 हजार मकानों की कुर्की करने की तैयारी :
सामने आयी सूची के मुताबिक करीब 10 हजार ऐसे लोग हैं, जिनका असेस्मेंट तो हो चुका है लेकिन पिछले दो साल से वो टैक्स जमा ही नहीं कर रहे हैं। ऐसे सभी भवन स्वामियों को  नोटिस देकर उनका मकान कुर्क करने की तैयारी है। उपाध्यक्ष अरुण तिवारी के मुताबिक इस संबंध में कर अधीक्षकों और जोनल अधिकारियों को निर्देश दिए जा चुके हैं।

अधिकारियों को देना होगा शपथपत्र :
टैक्स वसूली में लापरवाही सामने आने के बाद अब टैक्स वसूली में जवाबदेही तय कर दी गई है। जोनल अधिकारी, कर अधीक्षक और वार्ड निरीक्षकों को हर वार्ड से होने वाली वसूली का ब्योरा देना होगा। यही नहीं उन्हें इस बात का शपथपत्र भी देना होगा कि अब कोई मकान टैक्स के दायरे से बाहर नहीं है। इस बीच पिछले महीने ही इस साल टैक्स वसूली की टाइम लाइन भी जारी कर दी गई है।

यह है टाइम लाइन :
31 मई : सभी मकानों के हाउस टेक्स के बिलों का वितरण कर उसकी कॉपी वार्ड लिपिक को सौंपना।
1 जून : कर पुनरीक्षण की परिधि से छूटे हुए मकानों का कर पुनरीक्षण करना।
1 जून से 30 जून : सभी भवन स्वामियों से मिलकर उन्हें बिल सौंपना। कर अधीक्षक कम से कम 5 फीसदी बकाएदारों से स्वयं मिलेंगे।
1 जुलाई से 31 जुलाई : सभी राजकीय भवनों से कर वसूली और 10 हजार से ज्यादा धनराशि के बकाएदारों से संपर्क कर हाउस टैक्स जमा करवाना।
1 अगस्त से 15 अगस्त : कर निर्धारण की परिधि में उन मकानों को भी लाना, जो अब इससे छूटे हुए हैं।
15 अगस्त से 31 अगस्त : 10 हजार से अधिक बकाएदारों के खिलाफ कार्रवाई। बिल जमा ना होने पर कुर्की भी की जा सकती है।

टैक्स वसूली में बड़े पैमाने पर अनियमितता सामने आयी है। महज 60 पैसे और एक रुपया हाउस टैक्स कैसे तय हुआ? इसकी जांच करायी जाएगी। इसके साथ ही इस बार बड़े पैमाने पर टैक्स वसूली का अभियान चलाने की तैयारी है। जरूरत पड़ी तो टैक्स जमा ना करने वाले मकानों की कुर्की करायी जाएगी।
अरुण तिवारी, उपाध्यक्ष
नगर निगम

अफसरों के दबाव में पलट गए सदन के फैसले, कोई हटा ना पटल बदला


(रणविजय सिंह, पांच मई)

- नगर निगम के सदन की बैठक के बाद जारी हुए मिनट्स में बड़े पैमाने पर बदलाव को लेकर उठे सवाल
- पदों से ज्यादा तैनात अधिकारी और एक ही पटल पर वर्षों से काबिज बाबुओं के तबादले का कोई जिक्र नहीं

Ranvijay.singh1@timesgroup.com, लखनऊ
अफसरों के दबाव में नगर निगम ने सदन में लिए गए अपने कई फैसलों में बदलाव कर दिया है। शनिवार को मीटिंग के मिनट्स जारी होने पर पता चला कि अधिकारी और पुराने बाबुओं को लेकर हुए फैसलों को पलट दिया गया है। अपर नगर आयुक्त के तीन पदों पर तैनात सात अपर नगर आयुक्तों में से चार को हटाने और एक ही पटल पर वर्षों से जमे बाबुओं के तबादले को लेकर हुए फैसलों का जिक्र बैठक के मिनट्स में किया ही नहीं गया है।
नगर निगम के सदन की बैठक 29 मार्च को हुई थी। बैठक के तुरंत बाद नगर निगम की तरफ से सदन में लिए गए फैसलों की सूची जारी की गई। इसमें 14 बिंदुओं पर सदन ने अपना फैसला सुनाया था। इस बैठक में हुई बहस, आपत्तियों और फैसलों के मिनट्स शनिवार को जारी हुए। चौंकाने वाली बात यह थी कि इसमें बाकी बिंदुओं का तो जिक्र था लेकिन स्वीकृत पदों से ज्यादा तैनात अपर नगर आयुक्तों, एक ही पटल पर तीन वर्ष से ज्यादा समय से काबिज बाबुओं और दूसरे विभागों में जा चुके अधिकारियों को नगर निगम के कोष से वेतन दिए जाने पर लगायी गई रोक का कोई जिक्र नहीं था। इस बाबत पूछने पर कार्यकारिणी सदस्यों से लेकर नगर निगम के आला अधिकारियों तक के पास कोई सीधा जवाब नहीं है। वहीं

यह फैसले भी पलटे :
- शहर के विभिन्न स्थलों पर ग्राउंड बेस्ड मास्ट(मोनोपोल जीबीएम) स्थापित करने के निर्णय को मंजूरी दी थी लेकिन बैठक के मिनट्स में इस प्रस्ताव को खारिज दिखाया गया है।
- कार्यादायी संस्था के कर्मचारियों की बाइओमेट्रिक उपस्थिति करवाने और बैंकों के जरिए वेतन देने का फैसला हुआ था लेकिन इसका भी मिनट्स में जिक्र नहीं है।
- आवयकता से अधिक अधिकारियों को हटाने, सेवा निवृत्त को सेवा विस्तार दिए जाने और एक ही पद पर वर्षों से जमे कर्मचारियों, टैक्स सुपरिटेंडेंट्स व इंस्पेक्टरों को दूसरे जोन में भेजा जाना था लेकिन बैठक के मिनट्स से इन बिंदुओं को हटा दिया गया है।
- हैंड पंप/समर्सिबल की मरम्मत और सभी नालों और सीवर की सफाई 30 अप्रैल तक पूरी की जानी थी, जो अब तक नहीं हो सकी है।

तबादले के बाद भी जमे रहे अधिकारी :
नगर निगम के अपर नगर आयुक्त पीके श्रीवास्तव का तबादला मथुरा वृंदावन नगर निगम के लिए 27 फरवरी को हो चुका है। इसके बावजूद उन्हें अब तक रिलीव नहीं किया गया है। जोनल अफसर संजय ममगई तबादला नगर पालिका परिषद फरुखाबाद के लिए हो चुका है। वह भी अभी लखनऊ में ही जमे हैं। एक अन्य अपर नगर आयुक्त नंदलाल सिंह भी तबादले के बाद भी महकमे में बने हुए हैं।

अभी मैने बैठक के मिनट्स देखे नहीं हैं। रविवार को लखनऊ वापस आ रही हूं। बैठक के मिनट्स पढ़ने के बाद ही इस बारे में कुछ बताया जा सकता है। यह देखना पड़ेगा कि सदन के बाद इन बिंदुओं को हटाकर ही भेजा गया है या फिर मिनट्स तैयार करने में अधिकारियों की लापरवाही है।
संयुक्ता भाटिया, महापौर
लखनऊ

यूजर चार्ज घोटाला : तीन करोड़ 40 लाख वसूले लेकिन दस्तावेजों में दिखाया शून्य

(रणविजय सिंह, चार मई)

- नगर निगम के मुख्य वित्त एवं लेखाधिकारी कार्यालय में गड़बड़ी के आरोप, अधिकारियों की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल
- हर महीने जमा होते थे लाखों रुपये लेकिन अधिकारियों ने कोई रकम जमा ना होने की लगा दी रिपोर्ट, खुलासे से हड़कंप

Ranvijay.Singh1@timesgroup.com, लखनऊ
नगर निगम में कूड़ा उठान के नाम पर तीन करोड़ 40 लाख रुपये के गबन का खुलासा होने से महकमे में हड़कंप मच गया है। हर घर से कूड़ा उठाने के एवज में पिछले साल अप्रैल से इस साल फरवरी तक नगर निगम ने करीब तीन करोड़ 40 लाख रुपये वसूले लेकिन दस्तावेजों में उसे शून्य दिखा दिया गया। चौंकाने वाली बात यह है कि हर महीने लाखों रुपये की वसूली करने वाले अधिकारी इसे बड़ी चालाकी से कोई वसूली ना होने का दावा करते रहे। कार्रवाई से बेखौफ अधिकारियों ने सदन में पेश किए गए बजट में भी यूजर चार्ज के तौर पर एक भी रुपया जमा ना होने की रिपोर्ट लगा दी।
कार्यदायी संस्था और निगरानी करने वाले अधिकारियों से पूछताछ में नगर निगम के खाते में जमा की गई रकम का ब्योरा और भुगतान के हर दस्तावेज पर पर्यावरण अभियंता पंकज भूषण के दस्तखत सामने आने के बाद मामले का खुलासा हुआ। इसके बाद उपाध्यक्ष अरुण तिवारी ने इस पूरे मामले की जांच के आदेश देते हुए मुख्य वित्त एवं लेखाधिकारी निजलिंगप्पा को नोटिस जारी करते हुए जवाब-तलब किया है। आला अधिकारियों की नाक के ठीक नीचे इतना बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आने के बाद नगर निगम में हड़कंप मच गया है। अधिकारियों के पास इस सवाल का जवाब नहीं है कि जब हर महीने लाखों रुपये की वसूली होती रही और फरवरी तक एक करोड़ 40 लाख रुपये जमा कराया गया तो यह रकम आखिर गई कहां? मामले को सदन में उठाने वाले पार्षद और कार्यकारिणी सदस्य विजय कुमार गुप्ता ने महकमे में बड़े पैमाने पर गबन और घोटाले के आरोप लगाते हुए इसकी जांच कराने की मांग की है। उन्होंने इसमें कई बड़े अधिकारियों की मिलीभगत का आरोप भी लगाया है।

पार्षदों की शिकायत पर सदन ने दिए थे जांच के आदेश :
सदन में रखे गए बजट में अधिकारियों ने यूजर चार्ज के तौर पर एक भी रुपये की वसूली ना होने का दावा किया था। इसपर आपत्ति जताते हुए मालवीय नगर वार्ड की पार्षद ममता चौधरी और न्यू हैदरगंज प्रथम वार्ड के पार्षद विजय कुमार गुप्ता ने सवाल उठाया था। इन पार्षदों के मुताबिक वार्ड में हर घर से 100-100 रुपये की वसूली हो रही है। पार्षदों ने नागरिकों से वसूली होने के बावजूद यूजर चार्ज के मद में कोई रकम ना होने पर संदेह जताते हुए जांच की मांग की थी। इसके बाद सदन ने जांच का आदेश दिया था।

एजेंसी पर शक था लेकिन दागी निकले अधिकारी :
कार्यकारिणी सदस्य राजकुमार सिंह, गिरीश कुमार मिश्रा, मोहम्मद सगीर और विजय कुमार गुप्ता ने कई इलाकों में वसूली होने के बावजूद नागरिकों को बिल ना दिए जाने की शिकायत करते हुए कंपनी की भूमिका पर शक जताया था। हालांकि शुरूआती जांच में नगर निगम अधिकारियों की भूमिका पर ही सवाल उठने लगे हैं। उपाध्यक्ष अरुण तिवारी के मुताबिक सामने आए दस्तावेजों में साफ है कि कंपनी ने नागरिकों से वसूली गई रकम नगर निगम के हवाले कर दी लेकिन अधिकारियों ने इस मद के लिए तैयार रिपोर्ट में खेल किया।

नागरिकों से वसूली गई रकम हर महीने जमा करायी गई। इसका पूरा रेकॉर्ड मौजूद है। ऐसे में एक भी रुपया यूजर चार्ज जमा ना होने की बात सही है। ऐसा क्यों और कैसे हुआ? इसको लेकर मैं कुछ नहीं कह सकता। वसूली गई रकम से जुड़े सभी दस्तावेज मेरे पास हैं। जब भी मांगा जाएगा, मैं मुहैया करा दूंगा।
पंकज भूषण, पर्यावरण अभियंता
नगर निगम

मामला काफी गंभीर है। इस संबंध में मुख्य वित्त एवं लेखाधिकारी को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया गया है। जांच का आदेश भी जारी कर दिया गया है।
अरुण तिवारी, उपाध्यक्ष
नगर निगम

नगद भुगतान के बहाने हर महीने डेढ़ करोड़ की बंदरबांट


(रणविजय सिंह, दो मई)

- नगर निगम के कार्यकारिणी सदस्यों ने किया चौंकाने वाला खुलासा, अपर नगर आयुक्त ने जांच के लिए बनायी कमिटी
- सफाई कर्मचारियों की बैंक पास बुक में हुई एंट्री और उनके लिखित बयान लेकर पार्षदों ने आला अधिकारियों को सौंपे

Ranvijay.Singh1@timesgroup.com, लखनऊ
निजी एजेंसियों की तरफ से वार्डों में लगाए गए सफाई कर्मचारियों को नगद भुगतान के बहाने हर महीने एक से ड़ेढ़ करोड़ रुपये की बंदरबांट हो रही थी। आरोप है कि औसतन हर वार्ड में ऐसे 30 कर्मचारी लगाए गए हैं, जिनमें से आधे महज फर्जीवाड़े के लिए कागजों पर ही तैनात हैं। यही नहीं नगर निगम के खाते से इन कर्मचारियों के नाम पर हर महीने साढ़े सात हजार रुपये जारी किया जाता है जबकि कर्मचारियों को 5500 रुपये नगद भुगतान कर करोड़ों के वारे न्यारे किए जा रहे थे। कार्यकारिणी सदस्यों ने अपर नगर आयुक्त और नगर आयुक्त को पिछले दो साल के दरम्यान इन कर्मचारियों के बैंक खातों का ब्योरा और दूसरे दस्तावेज सौंपे हैं। इसके बाद इस मामले में जांच शुरू हो गई है।
कार्यकारिणी सदस्य राजकुमार सिंह और विजय कुमार गुप्ता ने इस बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा करते हुए इस खेल में महकमे के कई बड़े अधिकारियों के शामिल होने की आशंका जतायी है। राजकुमार सिंह के मुताबिक कार्यदायी संस्था के कर्मचारियों की बायोमीट्रिक उपस्थिति का आदेश जारी होने के बावजूद भी इसे लागू नहीं किया गया। यही नहीं अधिकारियों ने बैंक खातों में सीधे वेतन भेजने की व्यवस्था को अचानक ही बदल दिया गया। इसका फायदा उठाते हुए कार्यदायी संस्था ने अधिकारियों संग मिलकर वेतन घोटाला कर डाला। विजय कुमार गुप्ता के मुताबिक लखनऊ के 110 वार्डों में करीब 3000 सफाई कर्मचारी लगे हैं। आरोप है कि इनमें से 1500 कर्मचारी महज कागजों पर ही हैं, जिनके वेतन के तौर पर जारी होने वाला करीब डेढ़ करोड़ रुपये निजी एजेंसी अपने मुनाफे और महकमे के अधिकारियों को कमीशन बांटने में खर्च करती है। कार्यकारिणी सदस्य राजकुमार सिंह ने इन आरोपों के समर्थन में सफाई कर्मचारियों की पासबुक अधिकारियों के सामने पेश कर दी। इसमें वर्ष 2016 तक बैंक खातों में पैसा भेजा जाता था लेकिन उसके बाद यह व्यवस्था बदल दी गई और नगर निगम कर्मचारियों के बजाय एजेंसियों को भुगतान करने लगा। इसको लेकर पार्षदों ने 29 मार्च को हुए सदन में भी आवाज उठायी थी, हालांकि उस समय इसे महज आरोप मानते हुए गंभीरता से नहीं लिया गया था।

सफाई कर्मचारियों के लिए नगर निगम हर महीने साढ़े आठ हजार रुपये जारी करता है। इसमें से एक हजार के करीब एजेंसी का कमीशन होता है। इस कटौती के बाद भी कर्मचारियों को साढ़े सात हजार रुपये मिलना चाहिए लेकिन उन्हें महज 5500 रुपये भुगतान हो रहा है। इसके दस्तावेज अधिकारियों को सौंप दिए गए हैं।
राजकुमार सिंह, कार्यकारिणी सदस्य
नगर निगम


मैने अपने वार्ड में कभी भी निजी एजेंसी के सभी कर्मचारी एक साथ नहीं देखे। जितने कर्मचारियों का दावा कर नगर निगम से भुगतान लिया जा रहा है, उसका आधा कर्मचारी भी काम नहीं कर रहा। फर्जी कर्मचारियों के नाम पर करीब एक से ड़ेढ़ करोड़ रुपये का खेल हो रहा है।
विजय कुमार गुप्ता, कार्यकारिणी सदस्य
नगर निगम


कार्यकारिणी सदस्यों की तरफ से शिकायत हुई है। इसके बाद इस मामले की जांच शुरू कर दी गई है। जोनल अधिकारियों से एजेंसियों के सफाई कर्मचारियों का ब्योरा मांगा गया है। जांच के बाद दोषी पायी गई एजेंसियों के खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी।
नंदलाल सिंह, अपर नगर आयुक्त
नगर निगम

Sunday, 20 May 2018

बेटी ने किया था आवेदन और पिता स्क्रीनिंग कमिटी में थे

(रणविजय सिंह, 16 मई)

लोहिया इंस्टीट्यूट भर्ती घोटाला :

- लोहिया इंस्टीट्यूट के नेत्र रोग विभाग में हुए आवेदन और इंटरव्यू की जांच रिपोर्ट शासन को भेजी गई
- नेत्र रोग समेत कई विभागों में असिस्टेंट और असोसिएट प्रोफेसरों के चयन में धांधली की हुई है शिकायत

Ranvijay.singh1@timesgroup.com, लखनऊ
लोहिया इंस्टीट्यूट में विधानसभा चुनावों के बीच हुई असिस्टेंट और असोसिएट प्रोफेसरों की भर्ती में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियों के आरोप सही साबित होने लगे हैं। नेत्र रोग विभाग में हुए आवेदन और उसमें चहेतों को लाभ देने की शिकायत के बाद शासन को भेजी गई जांच रिपोर्ट में मिलीभगत और धांधली की पुष्टि हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक विभाग में आवेदन करने वाली एक अभ्यर्थी के पिता ही स्क्रीनिंग कमिटी में शामिल थे। यह जानकारी दोनों ने ही छिपाए रखी। संस्थान के निदेशक, चिकित्सा शिक्षा के प्रमुख सचिव, कैबिनेट मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री से हुई शिकायत के बाद मामले की जांच करायी गई। चिकित्सा शिक्षा विभाग के महानिदेशक डॉ़ केके गुप्ता ने अपनी जांच रिपोर्ट पिछले सप्ताह ही प्रमुख सचिव रजनीश दुबे को सौंप दी।
नेत्र विभाग के अलावा लोहिया इंस्टीट्यूट के कई अन्य विभागों में भी असिस्टेंट और असोसिएट प्रोफेसरों की भर्ती में भाई भतीजावाद की जांच चल रही है। ऐसे सभी मामलों में पीड़ितों ने गड़बड़ी के दस्तावेज और सुबूत महानिदेशक डॉ़ केके गुप्ता को सौंप दिए हैं। ऐसे में नेत्र विभाग की जांच रिपोर्ट में गड़बड़ी के खुलासे ने लोहिया इंस्टीट्यूट प्रशासन की भूमिका, मंशा और कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लोहिया इंस्टीट्यूट के नेत्र विभाग समेत करीब एक दर्जन विभागों में वर्ष 2016 में आवेदन लिए गए थे। ज्यादातर विभागों के लिए मार्च 2017 में इंटरव्यू कर चयन सूची जारी कर दी गई लेकिन नेत्र रोग विभाग समेत कुछ के इंटरव्यू रोक दिए गए। आरोप है कि नेत्र रोग विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए डॉ़ प्रमिला ठक्कर ने भी आवेदन किया था। उनके पिता प्रो़ एके ठक्कर न्यूरोलॉजी विभाग के एचओडी थे और उन्हें स्क्रीनिंग कमिटी का सदस्य भी बनाया गया था। प्रमुख सचिव से हुई शिकायत के मुताबिक आवेदन की तारीख तक डॉ़ प्रमिला ठक्कर के पास तीन साल का अनुभव नहीं था। लिहाजा इस विभाग का इंटरव्यू जनवरी 2018 तक टाला जाता रहा, ताकि उनका तीन साल का अनुभव पूरा हो सके। जांच अधिकारी डॉ़ केके गुप्ता की तरफ से प्रमुख सचिव कार्यालय को भेजी गई रिपोर्ट में यह आरोप सही पाए गए हैं। माना जा रहा है कि जल्द ही इस विभाग के लिए हुए इंटरव्यू पर कोई फैसला आ सकता है।

कदम दर कदम गड़बड़ी, विवाद और शिकायत :
_ लोहिया संस्थान में असिस्टेंट और असोसिएट प्रोफेसरों की भर्ती को लेकर इस साल मार्च में बड़ा खुलासा हुआ। आला अधिकारियों ने मानकों के विपरीत लोहिया अस्पातल के 10 डॉक्टरों को सीधे लोहिया इंस्टीट्यूट में नियुक्त कर लिया। एनबीटी के खुलासे के बाद आदेश वापस लिया गया।
_ करीब छह महीने बाद नए सिरे से विज्ञापन किया गया लेकिन बड़ी चालाकी से उसमें एक ही पद के लिए दो मानक रख दिए गए। एक बार फिर विवाद होने पर आदेश वापस लिया गया और नए सिरे से  विज्ञापन कर आवेदन लिए गए।
_ करीब एक साल बाद कई विभागों के लिए इंटरव्यू कराए गए लेकिन इसमें शामिल कई अधिकारियों के रिश्तेदार भी इंटरव्यू देने आए। मानकों के मुताबिक चयन प्रक्रिया की पूरी कवायद में ऐसे किसी भी अधिकारी को शामिल नहीं किया जाना चाहिए, जिसके रिश्तेदार भी उसमें आवेदक हों।

एसआर किया आंकोलॉजी में, नियुक्ति दी गाईनी में :
राम मनोहर लोहिया चिकित्सा संस्थान में डॉक्टरों की भर्तियों में गजब की बंदरबांट हुई। जिस अभ्यर्थी के पास सर्जिकल आंकोलॉजी (कैंसर) विभाग से तीन साल की सीनियर रेजीडेंटशिप का अनुभव था, उसने लोहिया इंस्टीट्यूट के महिला एवं प्रसूति विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए ना सिर्फ आवेदन किया बल्कि उसका चयन भी हो गया। इंस्टीट्यूट में पिछली सरकार के दौरान ऐन विधानसभा चुनाव से पहले बड़े पैमाने पर हुए असिस्टेंट, असोसिएट और प्रोफेसर पदों के लिए हुईं कई भर्तियों में ऐसी ही अनियमितताओं की शिकायत हुई है।

अभी हमें आदेश की कॉपी नहीं मिली है। आदेश पढ़ने के बाद ही तय होगा कि इंटरव्यू पर क्या फैसला किया जाए?
प्रो़ दीपक मालवीय, निदेशक
लोहिया इंस्टीट्यूट

पिता, बेटी, दामाद हो तो अप्वाइंटमेट लेटर, बाकी सभी बाहर


(रणविजय सिंह, 9 फरवरी)

_ चिकित्सा शिक्षा के प्रमुख सचिव रजनीश दूबे और चिकित्सा शिक्षा के महानिदेशक केके गुप्ता से हुई शिकायत
_ नेत्र विभाग में हुए इंटरव्यू के लिए न्यूरोलॉजी विभाग के एचओडी डॉ़ एके ठक्कर की बेटी को शामिल किए जाने को लेकर विवाद
_ संस्थान के करीब 10 विभागों की सूची भी जारी हुई, जिसमें अधिकारियों की पत्नी, बेटी या दामाद का ही किया गया सिलेक्शन

रणविजय सिंह/प्रांजल दीक्षित, लखनऊ
लोहिया इंस्टीट्यूट के करीब 10 विभागों में असोसिएट और असिस्टेंट प्रफेसर के पदों पर जितनी भी भर्तियां हुई हैं, उनमें से बड़ी संख्या यहां के अधिकारियों की पत्नी, बेटी या दामादों की है। नेत्र विभाग में एक साल पहले हुए आवेदन के लिए पिछले हफ्ते कराए गए इंटरव्यू के बाद इस मामले ने तूल पकड़ लिया। एक तरफ पीड़ितों ने चिकित्सा शिक्षा के प्रमुख सचिव रजनीश दुबे और महानिदेशक डॉ़ केके गुप्ता को इस संबंध में लिखित शिकायत सौंप दी। वहीं दूसरी तरफ आरटीआई एक्टिविस्ट चंदन वाजपेयी ने लोहिया संस्थान में नियुक्तियों की जांच कराए जाने की मांग करते हुए शासन को उन सभी असोसिएट और असिस्टेंट प्रोफेसरों की सूची भेज दी है, जो संस्थान के ही आला अधिकारियों के रिश्तेदार हैं।
लोहिया संस्थान में असोसिएट और असिस्टेंट प्रोफेसर के पदों पर आवेदन करने वाले अभ्यर्थियों ने चिकित्सा शिक्षा के प्रमुख सचिव रजनीश दुबे से मुलाकात की। अभ्यर्थियों का आरोप है कि नेत्र विभाग के लिए डॉ़ प्रॉलिमा ठक्कर का आवेदन कम अनुभव होने के बावजूद स्वीकार कर लिया। यही नहीं इंटरव्यू भी करा लिया गया। प्रमुख सचिव से हुई शिकायत के मुताबिक डॉ़ प्रॉलिमा ठक्कर लोहिया संस्थान में न्यूरोलॉजी के एचओडी प्रो़ एके ठक्कर की बेटी हैं। यही नहीं प्रो़ एके ठक्कर के दामाद डॉ़ पंकज अग्रवाल को भी हड्डी विभाग में नियुक्ति मिल चुकी है। यह इकलौता मामला नहीं है, जब आला अधिकारियों के रिश्तेदारों की नियुक्ति होने या कराए जाने के आरोप लग रहे हों। आरटीआई एक्टिविस्ट चंदन वाजपेयी के संस्थान के आधा दर्जन से ज्यादा विभागों में आला अधिकारियों ने अपने रिश्तेदारों का चयन किया या करवा दिया। चंदन के मुताबिक बायोकेमिस्ट्री विभाग में चयनित डॉ़ ज्योति जॉन संस्थान में ही फिजीयोलॉजी विभाग के एचओडी प्रो़ एनए जॉन की पत्नी हैं। कम्युनिकेटिव मेडिसिन विभाग में चयनित डॉ़ मनीष कुमार वर्मा किंग जॉर्ज मेडिकल युनिवर्सिटी में फिजीयोलॉजी विभाग के एचओडी प्रो़ नरसिंह वर्मा के बेटे हैं। संस्थान के महिला प्रसूति विभाग में चयनित पूजा गुप्ता संस्थान के सुब्रत चंद्रा की पत्नी हैं। यही नहीं डॉ़ देव्यानी मिश्रा तो कार्डिएक के एचओडी और कई सिलेक्शन कमिटियों में शामिल रहने वाले प्रो़ मुकुल मिश्रा की बेटी हैं। यही नहीं डॉ़ चारू महाजन भी संस्थान के डॉ़ आशीष सिंह की पत्नी हैं। रेडियोलॉजी विभाग में सिलेक्ट डॉ़ नेहा संस्थान के ही डॉ़ दीपक कुमार सिंह की पत्नी हैं। इसके अलावा जनरल मेडिसिन में सिलेक्ट हुए डॉ़ विक्रम सिंह और डॉ़ मृदु सिंह पति पत्नी हैं। बाल रोग विभाग में डॉ़ दीप्ति अग्रवाल और डॉ़ स्वरेंद्र भी पति पत्नी ही हैं। एनेस्थीसिया और न्यूरोलॉजी में भी हुई नियुक्तियों में अधिकारियों पर अपने चहेते छात्रों के चयन के लिए पक्षपात करने के आरोप लगे हैं।

हमारे पास शिकायत आयी है। हमें यह जानकारी नहीं थी। कुछ पीड़ितों ने मुलाकात कर इस संबंध में दस्तावेज भी सौंपे हैं। मामले की जांच करायी जा रही है। इसके साथ ही अब जितनी भी नियुक्तियों से जुड़े दस्तावेज आएंगे, उनकी गहन समीक्षा और पड़ताल भी करायी जाएगी।
डॉ़ केके गुप्ता, महानिदेशक
चिकित्सा शिक्षा

रिश्तेदारों को फायदा देने के लिए एक साल तक टालते रहे इंटरव्यू


(रणविजय सिंह, 8 फरवरी)

_ लोहिया इंस्टीट्यूट में पिछले सप्ताह हुए इंटरव्यू के बाद प्रमुख सचिव और सीएम से हुई शिकायत
_ एक विभागाध्यक्ष की बेटी को लाभ देने के लिए एक साल तक इंटरव्यू टाले जाने का लगा आरोप

Ranvijay.singh1@timesgroup.com, लखनऊ
लोहिया इंस्टीट्यूट में असिस्टेंट और असोसिएट प्र्रोफेसरों की नियुक्ति को लेकर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा। ताजा मामला पिछले दिनों हुए इंटरव्यू के बाद सामने आया। कुछ अभ्यर्थियों की तरफ से संस्थान के निदेशक, चिकित्सा शिक्षा के प्रमुख सचिव, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र भेजकर इंटरव्यू में भाई भतीजावाद किए जाने का आरोप लगाया गया है। शिकायत करने वालों के मुताबिक कुछ विभागों में हुए इंटरव्यू में संस्थान के विभागाध्यक्ष और अधिकारियों के रिश्तेदारों को भी शामिल किया गया। इनमें से कुछ ऐसे थे जिनके पास तीन साल के बजाय केवल दो साल का अनुभव था लेकिन उन्हें लाभ देने के लिए इंटरव्यू करीब एक साल बाद करवाया गया। यही नहीं नियुक्ति की कवायद में इन आवेदकों के रिश्तेदारों की अहम भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
लोहिया इंस्टीट्यूट के नेत्र विभाग समेत करीब एक दर्जन विभागों में वर्ष 2016 में आवेदन लिए गए थे। ज्यादातर विभागों के लिए मार्च 2017 में इंटरव्यू कर चयन सूची जारी कर दी गई लेकिन नेत्र रोग विभाग समेत कुछ के इंटरव्यू रोक दिए गए। आरोप है कि मार्च 2017 तक इन विभागों में आवेदन करने वाले कुछ आवेदकों के पास तीन साल तक एसआर का अनुभव नहीं था। ऐसे कुछ आवेदक लोहिया संस्थान के आला अधिकारियों के रिश्तेदार भी थे। लिहाजा इंटरव्यू जनवरी 2018 तक टाल दिया गया। अब इंटरव्यू होने के बाद इस देरी को लेकर आवेदकों की तरफ से सीएम तक से गुहार लगायी गई है। शिकायती पत्र में विभागाध्यक्षों के उन रिश्तेदारों का नाम और उनकी योग्यता पर सवाल उठाने वाले दस्तावेज भी भेजे गए हैं। शासन को भेजी गई शिकायत में उन विभागों का ब्योरा भी भेजा गया है, जहां चयनित अभ्यर्थी लोहिया संस्थान के आला अधिकारियों के ही रिश्तेदार थे।

कदम दर कदम गड़बड़ी, विवाद और शिकायत :
_ लोहिया संस्थान में असिस्टेंट और असोसिएट प्रोफेसरों की भर्ती को लेकर इस साल मार्च में बड़ा खुलासा हुआ। आला अधिकारियों ने मानकों के विपरीत लोहिया अस्पातल के 10 डॉक्टरों को सीधे लोहिया इंस्टीट्यूट में नियुक्त कर लिया। एनबीटी के खुलासे के बाद आदेश वापस लिया गया।
_ करीब छह महीने बाद नए सिरे से विज्ञापन किया गया लेकिन बड़ी चालाकी से उसमें एक ही पद के लिए दो मानक रख दिए गए। एक बार फिर विवाद होने पर आदेश वापस लिया गया और नए सिरे से  विज्ञापन कर आवेदन लिए गए।
_ करीब एक साल बाद कई विभागों के लिए इंटरव्यू कराए गए लेकिन इसमें शामिल कई अधिकारियों के रिश्तेदार भी इंटरव्यू देने आए। मानकों के मुताबिक चयन प्रक्रिया की पूरी कवायद में ऐसे किसी भी अधिकारी को शामिल नहीं किया जाना चाहिए, जिसके रिश्तेदार भी उसमें आवेदक हों।
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दो विभागों के लिए इंटरव्यू हुआ था। नेत्र विभाग का रिजल्ट अभी आना बाकी है। इस विभाग की एक आवेदक के रिश्तेदार लोहिया इंस्टीट्यूट में हैं लेकिन उसे फायदा देने के लिए इंटरव्यू में देरी के आरोप बेबुनियाद हैं। उसके पिता दूसरे विभाग के अध्यक्ष हैं, लेकिन उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। आवेदन के वक्त तीन साल का अनुभव था या नहीं? इसकी जानकारी नहीं है। शिकायत करने वाले पक्षपात्र के सुबूत दें तो जांच भी करा ली जाएगी।
डॉ़ दीपक मालवीय, निदेशक
लोहिया इंस्टीट्यूट

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